रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥
कबीर दास जी कितना सही कहते हैं कि हम अपना समय यूं ही व्यर्थ में बर्बाद कर देते हैं और फिर  दुखी होते हैं रात सोते हुए और दिन खाते हुए .....और हीरे जैसा अनमोल जन्म ऐसे ही सोते खाते बिता देते हैं और कौड़ी के भाव बना लेते हैं सीमा असीम 6,4,20  

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