रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय ।हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥कबीर दास जी कहते हैं कि हमें इतना सुंदर मानव जीवन मिला है इससे कीमती दुनिया में कुछ हो ही नहीं सकता है लेकिन हम समझ ही नहीं पाते और अपने बहुमूल्य जीवन को रात में सोते हुए दिन में खाते हुए बिता देते हैं और हीरे से अमूल्य जीवन को बेकार की कामनाओं और वासनाओं में लिप्त होकर खत्म कर देते हैं इससे दुखद क्या हो सकता है ...सीमा असीम 16,4,20 


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