सुनो, मेरे लबों पर मुस्कान है और पाँवों में थिरक चाँद खिला है और चाँदनी बिखरी है मन में भी उजाला चमक रहा  है और अंधेरा कहीं दूर दुबक गया है देखो कैसे पेड़ों पर छाई है हरियाली कि धूप कुछ और चटख हुई जाती है सच में मुझे अच्छा लगता है तुम्हें याद करना और मन में मीठा दर्द जगा लेना हाँ मुझे अच्छा लगता है तुम्हारा झूठ बोल जाना मैं जानती हूँ कि वो झूठ तुम मुझे नहीं खुद को बोलते हो तब मैं और ज़ोर से मुसकुराती हूँ तुम समझते हो न मुझे कि मैं हूँ तुम्हारी नसों में लहू की तरह और तुम मेरे रोम रोम में धड़कते हुए फिर कैसा सच और कैसा झूठ कोई फर्क नहीं पड़ता है प्रिय कभी भी नहीं न पड़ेगा जब जब कोई आया है हमारे बीच हम दूर नहीं हुए बल्कि और करीब आते गए कि वो जो बीच में था न न जाने कहाँ गुम गया आया था तोड़ने खुद टूट कर बिखर गया क्योंकि अडिग विश्वास कभी कोई कैसे तोड़ देगा भला सब टूट जाएगा दुनिया खत्म हो जाएगी लेकिन विश्वास नहीं खत्म होगा और यह विश्वास ही तो है जो कभी खत्म नहीं होने देगा न दुनिया और न ही हमारे सपने ....सीमा असीम 4,4, 20 

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