एक पत्र प्रेमिका का
           सुनो ,
                      मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ ,हाँ मैं सच में यह जानना चाहती हूँ बार बार हर बार ,,,कि मैंने जब तुम्हें प्यार किया और सिर्फ तुम्हें प्यार किया तो तुम मुझे प्यार क्यों नहीं कर पाये सिर्फ मुझे ही , क्यों भटके और भटकते ही गए क्यों अपमान किया प्रेम का , क्यों आखिर क्यों , क्या पाना चाहते थे , जो मैं तुम्हें नहीं दे पाई ? जो मैं पूरा नहीं कर पाई ,,, तन मन धन से पूरी तरह समर्पण किया और तुम फ्री का समझ मुझे लौटते रहे , मेरे साथ खिलवाड़ करते रहे , क्यों खेलते रहे आखिर क्या मिला तुम्हें मुझे दुख देकर , मुझे तकलीफ में डाल कर , क्या तुम सुखी हो गए , तुम्हें खुशियाँ मिल गयी  ? कितना रुलाया मुझे , दिन रात , सुबह शाम , मैं सिर्फ रोती रही, तुम भी तो नहीं हंस पाये न , मनाते रहे, करते रहे उसकी खुशामदें , उसकी मन्नतें , लुटाते रहे अपनी दौलत, देते रहे उसे वो सब जिस पर उसका हक नहीं था ,, वो गालियां दे रही , वो बदनाम कर रही थी और तुम बिलकुल बेबस हो गए मैं कितनी बार कहना चाहती , तुम्हारे मन की सुनना चाहती बाँट लेना था मुझे सब कुछ आधा आधा , लेकिन नहीं मैं नहीं कर पाई , सब अकेले ही सहा , झेला और बर्बाद हो गयी तुम्हें सँवरते हुए ,, मिट गयी ,, लेकिन मैं आज भी कहना चाहती हूँ , तुम्हें ही लिखना चाहती हूँ ,, क्या तुम समझ नहीं पाते हो , हाँ तुम समझते हो हर बात, तुम्हें आता है मेरा ख्याल , क्योंकि मेरे सच्चे प्यार के आगे तुम्हारा मन झुका जाता
है , तुम भी दर्द से भर जाते हो न ,,,, प्रिय मैं तुम्हें जितना प्यार करती हूँ न उससे कहीं ज्यादा तुम मुझे प्यार करते हो , तुम मेरे हो सिर्फ मेरे ,,, यह दुनिया , यह प्रकृति , यह कनात सब इस बात के गवाह हैं कि तुम मेरे हो और हमेशा रहोगे जन्म जन्मांतर तक , कोई भी हमें जुदा नहीं कर पायेगा , कोई हमें दूर नहीं कर पायेगा , खुद ईश्वर हमें मिलाएंगे बार बार लगातार , कि हम दो नहीं हैं हम एक हैं , और रहेंगे भी ,,,,
सीमा असीम
4,3,20 

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