सुनो
प्रेम करती हूँ न तुमसे
बस इसलिए ही अपना
तन मन धन
सब समर्पित किए रहती हूँ
और करती रहती हूँ तुम्हारा इंतजार
सिर्फ तुम्हारा इंतजार
कैसे मन में हुक उठती है
कैसे मन को समझाती हूँ
कैसे अपने अशकों को
बहलाती हूँ
मनाती हूँ
और कैसे अपने मन को
हर समय एकाग्र किए रहती हूँ
कभी सोचा है तुमने
कभी ख्याल आया है तुम्हें
कैसे अपने दर्द को छुपा लेती हूँ
कैसे तुम्हें मुस्कान दे देती हूँ
काभी सोचना प्रिय
काभी समझना प्रिय
कि तुम बिन यह जीवन निस्सार है
कि बात में हो तुम ही सबसे पहले और
सब बाद में
खुदा से पहले ही नाम लेती हूँ तुम्हारा
सब कुछ भुला कर तुम्हें जपती रहती हूँ हमेशा
मेरे प्रिय ध्यान देना काभी
काभी तो ख्याल करना
मेरे सपनों में तुम
मेरे ख्यालों में तुम
कि तुम बिन कुछ नहीं
कुछ भी नहीं 
सीमा असीम
12, 4, 20 

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