चिड़ियाँ सा चहचहाता है मन कभी
और कभी
उदास हो डाली को चोंच सा कुरेदता है मन
बैठ जाता है उदास निराशा होकर
चोंच में पकड़े दाने को
गिरा देता है जमीं पर
एकटक एक ही दिशा में निहारता है मन
क्यों ले गया उड़ा के कोई मन
क्यों कार दिया बेजान
बेजार मन
क्यों घूमता है बावला सा होकर मन
घोंसले के तिनकों को
चोंच से नोचते हुए
हताश चिड़िया सा मन
तुम्हारी राह देखता हुआ ! ! !
सीमा असीम

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