मैं कोमल डाली सी झुक जाती हूँ
तुम और झुका देते हो
मैं फ़िर कुछ और झुक जाती हूँ
तुम बार बार झुकाते जाते हो
आखिर कितना झुकाओगे मुझे
मैं तिनका तिनका होकर बिखर जाऊँगी
बिखरती तो अभी भी हूँ
समेट लेती हूँ ख़ुद को ख़ुद ही
ज़्यादा तोड़ा तो कहीं की नहीं रह पाऊंगी
हाँ मिट जाऊँगी और प्रीत अपनी
अमर कर जाऊँगी
प्रेम को अमर कर जाऊँगी
सदा सदा के लिये !
सीमा असीम

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद