बहुत ही मंथर गति से चलते हुए उसके कदम आगे बढ्ने से इंकार कर रहे थे , मन कितना भारी हो रहा था और आँखों से आँसू स्वतः बहते  जा रहे थे, मैं एक बार फिर से दौड़ कर उनके गले लग जाना चाहती थी ॥ मैंने देखा वे भी अपना बेग खींचते हुए चले जा रहे थे उनके कदमों में वो पहले जैसी रवानगी नहीं थी बड़े मंद मंद चलते हुए चले जा रहे थे हाँ वे देख सामने की तरफ रहे थे और मैं उनकी तरफ ! इतने हल्के कदमों से तो वे कभी भी नहीं चलते हैं ! मैं ठिठक कर उन्हें जाते हुए देखने लगी, एक हाथ कोट की जेब में और दूसरे में ट्रॉली बैग का हेंडल !  वे जा नहीं रहे थे बल्कि मेरे दिल में मन में और गहरे उतरते चले जा रहे थे ऐसा लग रहा था वे आ रहे हैं अपने मन से मेरे मन तक ! सिर्फ एक लालच कि वे पलट कर देखेंगे मुझे और इसी तरह टकटकी लगाए लगातार देखती रही जब तक वे आँखों से ओझल न हो गए ! अभी अभी तो हाथ मिलाया था गले से लगाया था कितना भर आया था मन बिना किसी वादे के हम मिलकर जुदा हो गए ! वैसे हम जुदा होकर भी जुदा कहाँ हुए थे कोई हमें जुदा कैसे कर पगा जब हमारे मन और प्राण एक हो चुके हैं ! मैंने भारी मन से अपना बैग उठाया और सीढ़ियाँ चढ़ने लगी ! कुली आया और पूछने लगा, मैडम जी मैं आपका बैग पहुंचा देता हूँ बताइये कौन से प्लेटफॉर्म पर जाना है ?
उसकी बात सुनी अनसुनी करते हुए मैं अपनी ही धुन में चढ़ती रही कोई और दिन होता तो पहले कुली को बुलाती और समान पहुँचने को कहती लेकिन आज तो मैं खुद में ही नहीं थी ! मैंने सीढ़ियाँ पार करके प्लेटफॉर्म एक पर पूछताछ काउंटर से मालूम किया तो पता चला हमारी आगे जाने वाली ट्रेन कैंसिल हो गयी है ! ओहह अब क्या करूँ एक तो मन परेशान और अब यह टेंशन !
अब जल्दी तो कोई दूसरी ट्रेन भी नहीं है रात बारह बजे से पहले , उस समय तक तो घर पहुँच जाऊँगी अगर अभी कोई जाने का साधन मिल जाये ! मैंने अपना हाथ हिलाकर ऑटो वाले को बुलाया वो कबसे हमारी ही तरफ आस लगाये, टकटकी नजरों से ताक रहा था ! मेरे हाथ हिलाते ही वो बड़ी खुशी के साथ तेज कदमों से चलता हुआ आया मानों नई जान भर गयी हो ! वैसे हमारे चलने की गति ही सब कुछ तय कर देती है कि हमारे मन में क्या चल रहा है !
दिमाग अभी भी उनकी तरफ ही लगा था लेकिन इस समय जरूरत थी मुझे गंतव्य तक सही प्रकार से पहुँचने कि क्योंकि इतना बड़ा अंजान शहर और मैं रात के इस समय में एकदम अकेली ! वैसे तो कोई डर की बात नहीं थी लेकिन रात का समय और जाने के साधन के बारे में मुझे अकेले ही मालूम करना था !
मैंने तुरंत निर्णय लेते हुए कहा, भाई जरा बस स्टैंड तक पहुंचा दो ! तभी पैसों का ध्यान आया, भाई पहले पैसे बता दो ? क्योंकि यहाँ पर पैसों के  चक्कर में पूरा शहर ही घूमा देते हैं आउटों वाले !
अरे मैडम जी मीटर लगा है न !
अब मेरा माथा फिर से ठनका की कहीं ये पिछली दफा की तरह पूरा शहर ही न घूमा दे सिर्फ अपने पैसे बनाने की खातिर !
भाई मीटर रहने दो एकमुश्त रकम बता दो कि कितने पैसे लोगो !
अरे मैडम जी जो चाहें दे देना सुबह से बोनी नहीं हुई !
ओहह यह परेशान है लेकिन यह बाद में मेरी परेशानी और न बढ़ा दे इसलिए पहले से ही पुंछ लेना बेहतर है !
मुनासिब पैसे ही देना जो यहाँ से वहाँ तक के बनते हैं !
अब मैंने जायदा कोई झिकझिक किए बिना उस पर बैठ गयी उसकी जरूरत जायदा बड़ी है अगर वो कुछ पैसे एक्स्ट्रा ले लेगा तो भी कोई दिक्कत नहीं !
हालांकि गलत पैसे देना या गलत बात स्वीकार करना मेरे हिसाब से सही बात नहीं है लेकिन उस इंसान की जरूरत को देखते हुए न जाने क्यों दिल दया से भर गया था !
ऑटो वाले ने मेरे हाथ से बैग ले लिया और ऑटो में सीट के पीछे रख दिया !
मैं भी आराम से सीट पर बैठ गयी ! अब तो पहले जल्दी से बस स्टैंड तक पहुँच जाऊँ और सीधी बस मिल जाये तो मन की घबराहट थोड़ी कम हो जाएगी एक तो उनसे दूर जाने का गम और दूसरा अकेले रात में सफर करने की टेंशन !

खैर किसी तरह से मन को काबू में किया और शांत मन से रस्तों को देखते हुए चलने लगी ! वैसे मेरी आदत नहीं है कि रास्तों को गौर से देखते हुए जाया जाए लेकिन आज तो मजबूरी थी और मजबूरी का नाम महात्मा गांधी ! मैं मन में ही मुस्करा दी !  जब कहीं पहुँचने की जल्दी हो तो अक्सर रास्ते लंबे हो जाया करते हैं ! आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा था ! जेहन में उनके भरी भरी कदम उठाते हुए चले जाना घमासान सा मचाए हुए था ! वे आ जाये वापस ! जब हम साथ होते हैं तब रास्ते कितने सकूँ भरे होते हैं और पता ही नहीं चलते कि कब गुजर गए ! इतने लंबा सफर भी बहुत कम और छोटा सा नजर आने लगता है ! दूरिया नज़दीकियाँ बन जाती हैं उनके नजदीक रहने भर से ही ! अचानक से आँखों से आँसू टपक पड़े ! ये आँसू भी बड़े गैरियत निभाने लगते हैं ठहरते ही नहीं हैं आँखों में ! खुद व खुद टपक पढ़ते हैं बहने लगते हैं आँखों से ! जी चाहा अभी अपनी बाहें फैलाकर उन्हें  पुकार लूँ और अपनी बाहों में भरकर कलेजे से लगा लूँ ! क्यों तन्हा छोड़ कर चले जाते हो? क्यों नहीं मेरे दर्द को समझते? क्यों नहीं हमें हमेशा अपने संग रखते हो ? लेकिन मेरी आवाज गले में ही घुट कर रह गयी ! मैं चाह कर भी कुछ बोल नहीं पायी ! आखिर बोलती भी कैसे इस पब्लिक प्लेस पर और आउटों वाला काया सोचेगा ? वैसे हम लोग अपनी आधी जिंदगी इसी सोच में गुजार देते हैं कि कोई क्या सोचेगा ? कोई क्या कहेगा ? और इन सब कारणों से ही हम अपना मन मार लेते हैं जीते जी जहर का घूंट पी लेते हैं बिना उफ़्फ़ किए ! अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं ! मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि अगर हम एकदूसरे को प्रेम करते हैं तो समाज को क्या आपत्ति ? क्या परेशानी ? लेकिन हमारे सोचने से क्या होना है ? उयर क्या हो जाएगा ?
क्रमशः
सीमा असीम

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