बहुत प्यार है न तुम्हें पौधों से
पेड़ों से
रोपते रहते हो उन्हें
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ
सींचते भी हो न
प्रेम भरे स्पर्श से सहला भी देते हो
फल फूल पत्ती डाली
सबको निहारते हो न
दुलार से
बहुत प्रेम है तुम्हें प्रकृति से
प्रेमिका की तरह
कोमल हृदय भी हो
तो क्यों हो जाते हो कठोर
क्यों नहीं कभी मेरा ख़याल
जो तुम्हें मानती है अपना प्रेमी
करती हूँ सच्चे दिल से तुम्हारी परवाह
बार देती हूँ अपना सबकुछ
तुम्हारी ख़ुशी के लिये
क्या तुम्हें ज़रा भी फ़िक्र नहीं होती ? ?
सीमा असीम

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