मेरी आँखों में आँसू है
डबाडब भरे हुए
और मन में बेइंतिहा उदासी
पल पल तुम्हारी याद
मुझे जीने नहीं दें रही
कैसे सब्र का दामन पकड़ूं
ऐसा लगता है सब्र ही मुझसे रूठ गया है
जैसे किसी मासूम बच्चे की तरह से
जो मुँह फुला लेता है
या रो रो कर घर भर देता है
अपनी मनपसंद चीज़ न मिलने पर
मैं चाहत की डोर से बँधी
खिंची चली आती हूँ
और तुम यूँ ही बाद में याद करना ही भूल जाते हो
सुनो प्रिय तुम आ जाना जब
सर्दियां कुछ कम हो जायें
आ ज़रूर जाना तुम
मैं तुम्हारे इंतज़ार में बैठी हूँ
पल पल में अश्रु बहाते हुए ! !
सीमा असीम

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