वो लड़की


सुना तुमने ? दामोदर बाबू की लड़की भाग गई।’’
‘‘कौन? बड़ी वाली?’’
‘‘पता नहीें, तीनों की तीनों तो कठैला जवान थीं।’’
‘‘जब कोई पच्चीस बरस तक कुँवारी पठिया घर में बाँधे रहे, तो भागेगी नहीं? घास खानेवाली बकरी तो छह महीने में ही मिमियाने लगती है।….कुछ पता चला, किसके साथ भागी है?’’
‘‘मुहल्ले के सारे परवाज तो वहीं हैं।’’
‘‘लौडिया तो छुपा रुस्तम निकली!’’
‘‘बेचारे दामोदर बाबू की इज्जत धूल में मिल गई। भागी तो वह थी दो दिन पहले, लेकिन बात आज खुली है।’’
‘‘यह चिड़िया तो तुम्हारे पड़ोस की थीं। तुमने दाना नहीं डाला?’’
‘‘यार, वह तो किसी की मुँडेर पर बैठती ही नहीं थी। जाने कैसे किसके जाल में फँस गई।’’
‘‘रत्तो ! दामोदर की बेटी ने तो हद कर दी। बाप की पगड़ी का जरा भी खयाल नहीं रखा। तुम्हारी सोनी तो बीस पार कर रही है। जरा नजर रखियो। जमाना जाने कैसा हो रहा है!’’
‘‘ दीदी, जमाने को तो खराब कर रखा है इन सिनेमावालों ने। यथार्थ-चित्रण के नाम पर पर्दे पर ऐसी-ऐसी हरकतें होती हैं कि….और वही उल्लंग लपक-चिपक दुहराई  जाती है टी.वी. के पर्दे पर भी।’’
‘‘हाँ, उससे जवान लड़के-लड़कियों का मन तो बहकता ही है।’’
‘‘मेरे वो तो खुद चिंता में है।। दो साल से लड़के के लिए दौड़ रहे हैं, लेकिन कोई नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता। लगता है, गरीबों की लड़कियाँ कुँवारी ही रहेंगी।’’
‘‘चार-चार जवान बेटियाँ। दामोदर बाबू ठहरे ईमानदार किरानी। घूस-पेंच से मतलब नहीं। लड़केवालों को पढ़ी-लिखी और सुंदर लड़की चाहिए। ऊपर से दहेज। बेचारे दामोदर बाबू लाख-दो लाख कहाँ से लाते उनकी बड़ी लड़की पद््मा….’’
‘‘भाग गई थी। कुछ पता चला?’’
‘‘हाँ, चाची! उसकी लाश चोर वाले कुएँ में मिली है। लड़की से बाप की चिंता और परेशानी नहीं सही गई। डूबकर मर गई।’’

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