गतांक से आगे
रंगीला रे तेरे रंग में
रंगा है मेरा तन मन
सुनो प्रिय
               कितनी जल्दी गुजर जाते हैं न ये खुशी भरे दिन ,,, पता ही नहीं चलता कब आए और कब गुजर गए ,,,,कितनी सारी खुशियाँ भर देते हैं दामन में और आँखों में छलक्ते आंसुओं से हमें अमीर कर देते हैं ...कैसे पल पल तुम्हें छूने की चाह ,,,,कैसे तुम्हें अपनी बाहों में भर लेने की आकुलता ,,,कैसे तुम्हें खुद में समा लिया ...कैसे तुम्हें ही अपना अस्तित्व बना लिया ...तुम मेरा वजूद सा बन गए हो । ,कैसी घबराहट सी ,,कैसी बेचैनी सी हर समय ,,,,,मेरी धड़कन की गति पता है तुम्हें , कितनी बढ़ी रहती थी ...कहीं हमसे दूर न हो जाओ , कहीं हमारी आँखों से ओझल न हो जाओ .....और तुम्हें न जाने क्या हो गया, न जाने ? .......तुमने हमारे मिलन को भी कैसे विरह में बदल दिया ......तुमने हमारी खुशी को दुख में तब्दील कर दिया .....उस महिला ने न जाने क्या कह दिया ,,न जाने क्यों मेरी गलती के बिना भी तुमने मुझे सजा दी ,,,मेरे प्रिय तुम्हें पता है न मेरे प्रेम की तुम जितनी परीक्षा लोगे यह उतना ही ज्यादा गहरा होता चला जाएगा ,,,,लेकिन मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि तुम ऐसा कैसे कर लेते हो ? मैं तो तुम्हारे सिवा किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती लेकिन तुम्हारा उसके साथ हाथ पकड़ पकड़ के बात करना, उससे हंस हँस कर बात करना, उसके साथ ही जाकर बैठना कैसे कर पाये थे तुम ऐसा ? कितने रूप हैं तुम्हारे ? प्रिय क्या तुम्हें दर्द नहीं होता ?  क्या तुम्हें दुख नहीं होता  ?? क्या तुम्हें जरा भी तकलीफ नहीं होती ....अगर ऐसा है तो क्यों ? क्यों मेरे प्यारे प्रियतम ?? क्या तुम स्वार्थी हो ? क्या तुम स्वार्थ की खातिर मिलते हो ? जब मिलते हो तो कितना प्रेम फिर दूर जाने से पहले ही तुम्हारा न जाने कैसा रंग आ जाता है कि मैं समझ ही नहीं पाती ,,कि मुझमें पत्नी और माँ का रूप नजर आने लगता है .....,मेरे प्यारे प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी प्रेमिका हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में डूबी हुई और इससे ज्यादा कुछ भी नहीं..... प्रिय तुम तो मेरे हो न फिर कैसी दूरी ...फिर कैसी दुनियाँदारी ? प्रिय प्रेम बहुत असीम होता है जितना डुबो और भी ज्यादा डूबाता चला जाता है प्रिय प्रेम में कोई हद कहाँ होती है बेहद होता है ...न कोई ओर न कोई छोर ....बस प्रेम और सिर्फ प्रेम ...मन में भरा रहता है एक एक अक्स, एक एक पल का ...प्रिय प्रेम में न कुछ पाया जा सकता है न खोया जा सकता है यह तो वो चीज है इसे जितना पाना चाहो और भी ज्यादा पाने की चाह ..... तृप्त होकर भी अतृप्त सा मन और कभी अतृप्त होकर भी तृप्त सा .......
प्रिय तुम खुद को ऐसा कैसे बनाते चले जा रहे हो ? क्या प्रेम कोई चीज है ? कोई वस्तु है ? जिसे कभी इस हांडी में डाला, कभी उस हांडी में डाला ....प्रिय तुम्हें पता नहीं है क्या कि मेरी दिन रात की लगन और तपस्या के बाद कुछ पल मिलते हैं सिर्फ चंद लम्हे ........प्रिय सुनो, आज मैं तुमसे कहती हूँ, लो अपने सच्चे दिल पर हाथ रखकर जो चाहें तुम करो, कभी किसी का हाथ पकड़ो, कभी किसी को गले लगाओ, कभी किसी के साथ घूमो .... लो मैंने ढील दी तुम्हें ॥लो मैंने सब्र को अपने सीने से चिपका लिया ,,लो भर लिया आँखों में आंसुओं का समंदर .......लो अब तुम खेल लो जी भर के खेल क्योंकि तुम्हारे लिए प्रेम सिर्फ खेल भर ही तो है न ......मैं यूं ही समर्पित रहूँगी हमेशा अपने तन मन और धन से भी, बस तुम मुझे समझाने की कोशिश कभी मत करना, न झूठ सच कहकर दिलासा दिलाना .....ये प्रेम का रिश्ता है प्रिय , ये दिल का रिश्ता है प्रिय, ये बिना कहे भी सब समझता है .....मुझे सब पता चल जाता है अंधेरे में भी सब चमक जाता है तो झूठी बातें करके मुझे बहलाना कैसा ? न मैं पहले  जीतना चाहती थी तुम्हें , न अब ,,,,,क्योंकि मैं पहले ही सब हार चुकी हूँ तुमने मुझे हरा दिया था और तुम्हारा प्यार जीत गया था ! प्रिय सुनो हारे हुए लोग खेल नहीं खेलते, वे सच को जीते हैं अपनी मौत को संग लेकर चलते हैं .....
क्रमशः
 सीमा असीम

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

यात्रा