कविता

आपके पास
मैं आ जाती हूँ मन वही रह जाता है
मैं चली आती हूँ जान वही रह जाती है
बिना जान का जिस्म बिना मन की मैं
पल पल तुम्हें पुकारती हूँ बाबरी सी बन
हर जगह तुम्हें तलाशती हूँ रात को सोना
एक बहाना होता है असल में तुम्हारा
ख्वाबों में आने की चाहत लिये पलकें बंद
कर लेती हूँ, तुम्हें अपनी बाहों में समेटने की
चाहत, तुम्हें अपने गले लगाकर चूमने का मन
बढ़ी हुईं धड़कने कैसे शोर मचाती हैं
ठहरती ही नहीं प्रिय अब तुम ही बताओ
क्यों धड़कता है दिल ? क्यों पुकारता है मन ?
क्यों रोती हैं आँखें ? क्यों तलाशती हूँ तुम्हें ?
क्या तुम्हारा होना ही काफ़ी नहीं है
क्या तुम्हें अपना वजूद बना लेना ही बहुत नहीं है
तो कैसा रोना, मचलना, तड़पना, पुकारना
और ढूंढना, तलाशना ? ?
सीमा असीम

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