मेरे ढलकते हुए आँसूओं की एक एक बूँद पर
तुम्हारा अक्स उभर आया है
और बिखर गय है मेरे अंग अंग पर
रोम रोम पर
मेरे आसपास
देखने लगा है मुझे प्रेम से निहारता हुआ
मेरे व्याकुलता से भरे मन को दिलासा देता हुआ
मैं अपनी घबराहट छुपा कर पूछने लगती हूँ
तुमसे एक बात
पिया कहीं तुम्हें मेरी याद तो नहीं आती
कहीं तुम भी बेचैनी से तो नहीं भर जाते
कहीं तुम भी तो बावला बनकर मुझे तो नहीं पुकारते
कहीं तुम भी रात को करवटें बदलते हुए रात तो नहीं गुजारते
प्रिय तुम ध्यान से सुनना मेरी बात मैं ख़ुश हूँ
हर परवाह से बेपरवाह होकर
कि सर्दियां बहुत हैं सो ठंड बहुत लगती है
बस बाकी सब सही है मैं ठीक हूँ
धूप अब तेज़ होकर बिखरने जो लगी है न ! !
सीमा असीम

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