न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछुड़े पियारे
उन्हीं से नेह लगा है हमन को बेकरारी क्या !!
सुनो प्रिय
ये जो पल पल तुमसे बात करती रहती हूँ न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे दिल में कुछ फंस सा गया है गले में कुछ अटक सा गया है और जुबान कुछ कहते कहते अटक सी गई है फिर भी मैं तुमसे कहती रहती हूँ कुछ न कुछ और तुम सुनते रहते हो यूं ही चुपचाप बैठे हुए और कभी तुम कहते हो तो मैं तुम्हें अपलक देखती रहती हूँ मुस्कराते हुए लेकिन प्रिय ये हंसने खिलखिलाने के दिन बड़ी जल्दी से निकल जाते हैं न बचे रह जाते हैं तो सिर्फ आँखों में आँसू ,,,, जो नम किए रहते हैं मेरा मन ,,,,,,जब मैं बेचैन होती हूँ तो मेरे मन सिर्फ इतना सा ख्याल आता है कि तुम खुश तो हो न ,,,,,कहीं कोई तकलीफ तो नहीं .......न जाने कैसी बेबसी सी है जो कुछ कुछ मन पर छाई हुई है इन दिनों ॥....मेरे प्रिय मुझे याद आता कि वो तुम्हारा सिगरेट के काश लेते हुए आधी सिगरेट को यूं ही सुलगते हुए फेंक देना कितनी देर तक वो यूं ही सुलगती रहती होगी ? न जाने कितनी देर तक यूं ही धुआँ उगलती रहती होगी ......... वो तुम्हारे पीछे पीछे मेरा चलते चले जाना ,,,,,न जाने क्या पाने की आस में तुम्हारा यूं करना .....मैं प्रेम की छलकती हुई गागर सी, न जाने कितनी सदियों से बूंद बूंद करके भर के रखी हुई थी ...पल पल तपस्या करते हुए मिलन की आस लगाए ........ सुनो मेरे प्रिय तुम्हारे पैर के अंगूठे को अपने होठों से चूम कर मैंने अपने मन मन के रेशे रेशे में तुम्हारा सर्वस्व उतार लिया है .......एक ऐसी डोर से बंधा है जो दिखती ही नहीं है ...पर सच्ची है, कहीं कोई गाँठ नहीं, कोई अडचन नहीं ,,,, तुमने जो डोर बांधी थी न उसे सच्ची लगन के साथ मैंने मजबूत कर ली है .........लो अब जोड़ लिया मैंने तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम ........ओहह ये कैसे अश्क छल्क पडे आँखों से .....खुशी के हैं शायद हाँ प्रिय ये खुशी के ही हैं ..........
मेरे सोहना तु सुन जरा
दिल दिया है कि
सच्ची मोहबब्त निभा के .........
क्रमशः
सीमा असीम
उन्हीं से नेह लगा है हमन को बेकरारी क्या !!
सुनो प्रिय
ये जो पल पल तुमसे बात करती रहती हूँ न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे दिल में कुछ फंस सा गया है गले में कुछ अटक सा गया है और जुबान कुछ कहते कहते अटक सी गई है फिर भी मैं तुमसे कहती रहती हूँ कुछ न कुछ और तुम सुनते रहते हो यूं ही चुपचाप बैठे हुए और कभी तुम कहते हो तो मैं तुम्हें अपलक देखती रहती हूँ मुस्कराते हुए लेकिन प्रिय ये हंसने खिलखिलाने के दिन बड़ी जल्दी से निकल जाते हैं न बचे रह जाते हैं तो सिर्फ आँखों में आँसू ,,,, जो नम किए रहते हैं मेरा मन ,,,,,,जब मैं बेचैन होती हूँ तो मेरे मन सिर्फ इतना सा ख्याल आता है कि तुम खुश तो हो न ,,,,,कहीं कोई तकलीफ तो नहीं .......न जाने कैसी बेबसी सी है जो कुछ कुछ मन पर छाई हुई है इन दिनों ॥....मेरे प्रिय मुझे याद आता कि वो तुम्हारा सिगरेट के काश लेते हुए आधी सिगरेट को यूं ही सुलगते हुए फेंक देना कितनी देर तक वो यूं ही सुलगती रहती होगी ? न जाने कितनी देर तक यूं ही धुआँ उगलती रहती होगी ......... वो तुम्हारे पीछे पीछे मेरा चलते चले जाना ,,,,,न जाने क्या पाने की आस में तुम्हारा यूं करना .....मैं प्रेम की छलकती हुई गागर सी, न जाने कितनी सदियों से बूंद बूंद करके भर के रखी हुई थी ...पल पल तपस्या करते हुए मिलन की आस लगाए ........ सुनो मेरे प्रिय तुम्हारे पैर के अंगूठे को अपने होठों से चूम कर मैंने अपने मन मन के रेशे रेशे में तुम्हारा सर्वस्व उतार लिया है .......एक ऐसी डोर से बंधा है जो दिखती ही नहीं है ...पर सच्ची है, कहीं कोई गाँठ नहीं, कोई अडचन नहीं ,,,, तुमने जो डोर बांधी थी न उसे सच्ची लगन के साथ मैंने मजबूत कर ली है .........लो अब जोड़ लिया मैंने तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम ........ओहह ये कैसे अश्क छल्क पडे आँखों से .....खुशी के हैं शायद हाँ प्रिय ये खुशी के ही हैं ..........
मेरे सोहना तु सुन जरा
दिल दिया है कि
सच्ची मोहबब्त निभा के .........
क्रमशः
सीमा असीम
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