गतांक से आगे
ये बंधन तो प्यार का बंधन है
जन्मों का संगम है
सुनो मेरे प्यारे प्रियतम,
सच एक ही होता है सबका, किसी के भी कई सच नहीं हो सकते हैं न प्रिय ? मेरा भी एक ही सच है सिर्फ एक सच ,,,, तुम समझते हो न फिर क्यों इधर उधर की बातों से भटकाना चाहते हो ? क्यों भ्रम को बढ़ाना चाहते हो ? क्यों करना चाहते हो ऐसा कि मैं मुस्कराना ही भूल जाऊँ ....भूल जाऊँ मैं जीना ..... प्रिय आसमान मे टंगे उस पूर्णिमा के पूरे चाँद को संग संग देखा था हमने, एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले हुए ,,,,मैंने उंगली दिखाते हुए कहा, देखो, ये हमारे प्रेम का साक्षी है न , तो तुम मुस्करा दिये थे ,,,,उस मुस्कान को कैद कर लिया था हमने जेहन में, सुनओ प्रिय अब जब कभी भी हम चाँद देखेंगे तब तुम वहाँ मुसकराना और हम यहाँ मुस्कराएँगे ........फिर आगे बढ़कर आरलिंगन में भरकर वो एक दूसरे को चूम लेना प्रिय क्या ये सच नहीं है ? क्या यह हमारे सच्चे प्रेम का सच्चा प्रतीक नहीं है?
प्रिय कितनी बातें जो तुम कर रहे थे, मैं सुन रही थी सिर्फ तुम्हें जी भरके देखते हुए, मुस्करा रही थी ,,,हाँ प्रिय मैं मुस्करा लेना चाहती थी, मैं हँस लेना चाहती थी, मैं खिलखिला लेना चाहती थी जी भर के ..........मैं जानती थी कि बस यही पल दो पल हैं जो सिर्फ हमारे हैं ....सिर्फ हमारे हैं ....तुमने मेरे माथे को चूमते हुए कहा था, तेरी खुशी की चाभी तो तेरे ही पास है तू क्यों परेशान होती है लेकिन प्रिय मेरी खुशी की चाभी तो सिर्फ तुम हो ,,, सिर्फ तुम ही हो .....क्योंकि मैंने उस वक्त तुम्हारे माथे पर बड़ा सा लंबा रोचना लगा कर , तुम्हारे गले में उस माला को डाल कर, अपना सर्वस्व तुम्हें ही सौंप दिया था, अब तुम चाहें मुझे कोई भी सुख दो, दुख दो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है कोई भी नहीं .......तुम्हें ही अपना रब माना है, तो तुम मुझे सताओगे तो उसका सारा फल तुम्हें ही तो चुकाना पड़ेगा ......निभाना तुम्हारा फर्ज़ है अगर नहीं निभाओगे तो तुम खुद ही टूट कर बिखर जाओगे ........लोगों का काम तो सिर्फ कहना है, तो क्या उनके कहने पर मुझे रुलाओगे, बोलो प्रिय क्यों करते हो तुम ऐसा ? प्रिय याद करो तुमने तो मुझे कितने बरस पहले ही अपना बना लिया था याद है न मेरे गले में अपनी बाहों का हार डाल कर , मेरे माथे को चूमते हुए दुनियाँ के सारे सुख मेरी झोली में डालकर, मेरे सारे दुख अपने नाम कर लिए थे फिर मुझे इतने दुख और दर्द कहाँ से मिल गए ? कहाँ से तुमने खोज खोज कर दुखों की पोटली बना कर मेरे दामन में भर दी .......... मेरे प्रिय मेरा प्रेम यूं ही बरकरार रहेगा भले ही मेरे जिस्म से जान फना हो जाये ....... मेरी आत्मा के सच्चे सहचर, मेरे प्रिय कभी मैं डर जाती हूँ कि मेरे प्रेम की जलती हुई जोत तेज होकर कहीं फकफका न उठे,........ दुआ में उठे हुए हैं मेरे हाथ तुम्हारी ही खुशी के लिए ही तो हैं .....प्रिय मैं तो सिर्फ तुम्हारी ही हूँ सिर्फ तुम्हारी ........
ये अश्क आँखों से क्यों छलक छलक जाये
ये दर्द कैसा मेरे सीने से लिपटा हुआ है !! क्रमशः
सीमा असीम
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