साथिया तू मेरा साथ निभाना
सदा तू मेरा ही बनकर रहना
मेरे हाथ दुआ में उठ जाते हैं और लब कुछ बुदबुदाते हैं ,,,नहीं सहा जाता है दर्द और दिल घबरा जाता है तेज दर्द उठता है मेरे सीने में ... और खुद को और भी ज्यादा घायल कर लेती हूँ और भी ज्यादा चोट पहुंचा लेती हूँ ताकि हर जख्म से खून रिसे , खूब बहे खून लाल सुर्ख खून ... बहता ही जाए, न बचे जिस्म में जरा सा भी, जब मैं तुम्हें गलत पाती हूँ और सब समझ जाती हूँ तो शर्मिंदा हो जाती हूँ सोच पर अपनी या शायद तुम्हारी पर भी क्योंकि तुम अलग नहीं हो मुझसे ,, मैं हूँ तो तुम हो और तुम हो तो मैं हूँ ,,,अगर तुम गलत हो तो शायद मेरी कोई न कोई गलती जरूर हुई होगी , तभी तुम गलत हुए , और तुम गलतियाँ करते रहे ,,,, वो सब बातें जो तुमको मुझे कह देना था वो कोई और आकर बता रहा था ,,,अच्छा है जो भी है सब अच्छा है ,,,,तुमसे यही उम्मीद कर सकती हूँ मैं और यही करनी भी चाहिए ,,रोने से, खुद को घायल करने से कुछ भी नहीं होने वाला ,,, होगा वही जो होना होगा ,,,,तुम जैसे हो वैसे ही रहोगे ,,, मेरा प्यार सच्चा है और सच्चा ही रहेगा दिल में हमेशा बेपनाह प्यार भरा रहेगा ,,,,कितना प्रेम है जो मुझसे रोके नहीं रुक रहा ,,,,
चलो इस दुनिया के दस्तूर को निभाए हम
तुम हमें याद आओ और हम तुम्हें याद आयें ,,
सीमा असीम
12, 2,20 

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