मेरा नया उपन्यास 













हम नहीं जानते थे कि दुनिया में नफरत ज्यादा है और प्रेम बहुत कम ! बस ठोकरें लगती गयी हम समझते गए और ठोकरें भी हमारे अपनों की हो तो हम ज्यादा समझदार होते जाते हैं लेकिन क्या हम समझदार हुए ? नहीं न, क्योंकि हम अपनों से इतना प्रेम करते हैं , इतना अपना समझते हैं कि उनकी हर गलती को माफ करके चुपचाप अकेले दुख सहते रहते हैं , इसके बाद भी वे अपनी गलती को सुधारते नहीं हैं बल्कि वही गलतियाँ बार बार करते जाते हैं जिनसे हमें दुख हो और वही होता है ! हम दुख के सागर में डूबते चले जाते हैं पर उन अपनों से कुछ नहीं कहते जो  न हमें समझते हैं न ही हमारे दुखों को ! वैसे जो हमारे दुख को जरा भी नहीं समझे, हमारे अशकों की कदर न करे ? वो हमारा कैसे हुआ ? कैसे उसे हम अपना कह कर खुद का वलिदान करते रहते हैं ? कैसे उसको बढ़ावा देते रहते हैं ? क्यों हम अपने मन को समझा नहीं पाते हैं ? कैसे अपने दिल को दुखाते चले जाते हैं ? कैसे घायल किए जाते हैं ? आखिर क्यों ? किसके लिए ? उनके लिए जो अपने पन का मतलब तक नहीं जानते , अपनों के दुख तक नहीं जानते या हम खुद ही अपने दुख को सुख में बदलने के लिए इंतजार की  राह ताकते रहने के कारण >>>>>>>कुछ नहीं पता ...
सीमा  सक्सेना   असीम22,2,20 

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