अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भ न धूप।
यही तो सच है न कि इतना भी मत बोलो कोई तुम्हें सुने ही न तुम पर ध्यान ही दे या टूमेन कुछ समझे ही न और इतना चुप भी मत रहो कि सब शून्य हो जाये खत्म हो जाये और आप मूरखों की तरह से सब देखते ही रहो जैसे ज्यादा बारिश हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता ऊभ सी पैदा हो जाती कि क्या टिपिर टिपिर लगी पड़ी है अब तो मौसम साफ हो जाये यह बारिश नहीं लुभा रही दुख दे रही है वैसे ज्यादा धूप भी परेशान करती है और तपा देती है लगता है थोड़ी तो छाँव आए ,,,बस यही मतलब है कि अति या ज्यादती हर चीज की कष्ट प्रद होती है ....
सीमा असीम
27,2,20
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