मेरा नया उपन्यास 
कभी कभी मन कोरे कागज के समान हो जाता है लगता है कोई खुद ही लिख दे इसपर सच्ची इबादत ,,क्योंकि जब मन खाली खाली सा होता है तब आँख से आँसू बहते हैं और लबों से मुस्कान झरती है न किसी के लिए कोई दुआ न बददुआ , बस .... ऐसा ही हो जाता है अक्सर ही .... गहरा विश्वास , बहुत ज्यादा अंदर तक गया हुआ समाया हुआ एतबार ,हल्की सी चोट से घायल हो जाता है और उसे कितना भी सहलाओ, समझाओ न संभालता है और न ही समझता है क्योंकि या तो मन स्वार्थी होता है या फिर वो स्वार्थी जो विश्वास को जख्मी करता है ,,, मुझे लगता है जो भी स्वार्थी हो उसको उसकी करनी की सजा जरूर मिलनी ही चाहिए ताकि वो आगे से किसी को इस तरह से दुख न दे सके ,,परंतु हम अपने रिश्तों की गरिमा बनाए रखने की खातिर चुप रह जाते हैं और उन स्वार्थी लोगों को और भ ज्यादा बढ़ावा मिल जाता है ,,, उनकी यह प्रक्रिया रुकती नहीं है कभी निरंतर चलती ही रहती है ,,,,अनथक ....न जाने किसके भरोसे रहकर हम चुप रह जाते हैं और गुनहगार की आवाज कभी दबती नहीं है और तेज हो जाती है ,,,,

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