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Showing posts from April, 2020
कहना तो बहुत कुछ है तुमसे  पर कैसे कहें तुम ही कहो ॥ सुनो प्रिय         शायद तुम सब जानते हो समझते हो लेकिन मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं है न तुम्हारे पास तभी तुम खामोश हो जाते हो ,,पर सुनो खामोश रहना किसी भी बात का इलाज नहीं है और न ही सही तरीका है क्योंकि जब तुम मेरे हो सिर्फ मेरे तो फिर तुम किसी और के कैसे हो सकते हो और किसी और को गले कैसे लगा सकते हो ? बोलो बताओ ? क्या यही होता है विश्वास और आस्था का परिणाम कि तुम एक झटके में उस को तोड़ दो और खुद को सही साबित करने के लिए लगातार तोड़ते ही चले जाओ ,,इतने टुकड़े करो कि हर टुकड़े से तुम्हारा अक्स दिखने लगे ,,, सच में आज इंसान के अंदर इंसानियत बची ही नहीं है न उसके अंदर कोई भावना ,,,वो जीते जी भी मारे हुए के समान हो गया है ,,, तभी तो तुम मुझे दुख देते रहे एक शख्स जिसने तुम पर अपना तन मन और धन लूटा दिया उसे सिर्फ लूटते ही रहे कभी यह ख्याल भी नहीं आया तुम्हारे मन में कि यह भी एक इंसान है लेकिन नहीं तुम्हें तो उसे जीतना था और उसे जीतने की खातिर गिरते गए और इतना गिरे हो कि तुम खुद से भी नजर नहीं मिला पाते होग...
मुझे अब कुछ और दीवाना कर दे  कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं  सच कहूँ तो दिल इतना उदास और परेशान है कि समझ ही नहीं आता है क्या करू ? क्या लिखूँ और क्या कहूँ ? मैं सब भूल गयी सच झूठ से परे हो गयी ,,, नहीं याद मुझे कि मैं तुम्हें जानती भी हूँ , पहचानती भी हूँ कि तुम वो नहीं हो जो तुम थे अब कोई और है कोई अलग सा व्यक्ति ,,, तुम एक इंसान ही रहते वो भी सही था लेकिन तुम इंसान नहीं बल्कि एक व्यक्ति बन गए कोई आम व्यक्ति ,,, जिसे मैं जानती थी , पहचानती और समझती थी वो कहीं मिट गया है ,,,  असाधारण, अपरिमित, अनोखा और जादुई व्यक्तित्व वाला वो इंसान ...जिसे मेरे प्रेम ने हीरे की तरह चमका दिया था ,,, क्योंकि तराशा इतना कि हर कोना जगमगा उठा था ,,, फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि उसकी चमक धूमिल सी होने लगी धुंधलाने लगा अक्स ,,, मानों किसी ने उस पर मिट्टी उड़ेल दी हो किसी ने उसकी चमक को चुरा लिया हो ।,,, अचंभित हूँ सच में बहुत ही दुखी और तकलीफ में भी कि  आखिर ऐसा क्यों कर हुआ ,,,, सनम तुझे याद कर कर के रोये बहुत हैं  कि दम घुटने लगा है तुझे सोचती हूँ तो ... सीमा असीम  27,4,20 ...

कबीर

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही । सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।। जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब  :  प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया  – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।अर्थ
रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय । हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥ कबीर दास जी कहते हैं कि हमें इतना सुंदर मानव जीवन मिला है इससे कीमती दुनिया में कुछ हो ही नहीं सकता है लेकिन हम समझ ही नहीं पाते और अपने बहुमूल्य जीवन को रात में सोते हुए दिन में खाते हुए बिता देते हैं और हीरे से अमूल्य जीवन को बेकार की कामनाओं और वासनाओं में लिप्त होकर खत्म कर देते हैं इससे दुखद क्या हो सकता है ... सीमा असीम  16,4,20 
ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस। भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस। कबीर जी कहते हैं कि जब किसी अज्ञानी मूर्ख या कम अक्ल इंसान को देखता हूँ तो  मन को बहुत दुख होता है , बेहद कष्ट कि इस संसार रूपी सागर में कोई भी ऐसा व्यक्ति या इंसान नहीं है जो सही बात बताकर और भरम से निकालने वाला कोई तो हो जो इस भाव सागर से बालों से पकड़ कर खींच ले और मोह माया में डूबने से बचा ले ,,, सीमा असीम  14,4,20 
लिखती हूँ तेरा नाम उसे और गहरा कर उकेरती जाती हूँ  अपने दिल से आत्मा तक ले जाती हूँ  तुम करते रहना दिमाग की बातें प्रेम को परे कर के  मैं तो अपने दिल को और भी सच्चा करके रिश्ता निभाये जाती हूँ  क्यों दूँ मैं तुम्हें कोई दोष हो सकता है यही तुम्हारे संस्कार हो  गलत करना और उसे ही सही कहना लेकिन  मैं सही को कभी गलत क्यों कहूँ  मैं जो है सच उसे ही क्यों न सच कहूँ  मैं अपने संस्कार अब कभी नहीं छोड़ूँगी  बहुत हुआ अब मैं सिर्फ अपने मन की ही करूंगी  अपने मन की सुनुंगी  क्यों कहूँ मैं तुम्हारे मन की बातें  तुम ही कहो न  जो चाहे मन तुम्हारा करो  करते रहो एक दिन हार थक कर बैठ जाओगे  फिर देखना कितना पछताओगे  रोओगे सिर पकड़ कर अपना  एक बेगुनाह को जो इतना सताओगे  मैं कहाँ कहती हूँ तुम्हें कभी कुछ ओ मेरे सनम  मेरे दिल की आहें और आँखों की नमी  जो खुद ही आ जाती हैं उनका कोई इलाज है तुम्हारे पास  बोलो  बोलो न ... सीमा असीम  13,4, 20 
सुनो प्रेम करती हूँ न तुमसे बस इसलिए ही अपना तन मन धन सब समर्पित किए रहती हूँ और करती रहती हूँ तुम्हारा इंतजार सिर्फ तुम्हारा इंतजार कैसे मन में हुक उठती है कैसे मन को समझाती हूँ कैसे अपने अशकों को बहलाती हूँ मनाती हूँ और कैसे अपने मन को हर समय एकाग्र किए रहती हूँ कभी सोचा है तुमने कभी ख्याल आया है तुम्हें कैसे अपने दर्द को छुपा लेती हूँ कैसे तुम्हें मुस्कान दे देती हूँ काभी सोचना प्रिय काभी समझना प्रिय कि तुम बिन यह जीवन निस्सार है कि बात में हो तुम ही सबसे पहले और सब बाद में खुदा से पहले ही नाम लेती हूँ तुम्हारा सब कुछ भुला कर तुम्हें जपती रहती हूँ हमेशा मेरे प्रिय ध्यान देना काभी काभी तो ख्याल करना मेरे सपनों में तुम मेरे ख्यालों में तुम कि तुम बिन कुछ नहीं कुछ भी नहीं  सीमा असीम 12, 4, 20 
   कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव। सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ कबीर दास जी कहते हैं कि जो इंसान प्रेम नहीं करता या जिसके मन में प्रेम की कोई भावना नहीं है उसका जीवन निरर्थक है व्यर्थ है ,, और उसका जीना कोई जीना नहीं  है क्योंकि प्रेम का स्वाद न चखना और जीवन गवा देना उसी प्रकार है जैसे कोई मेहमान किसी सुने घर में आता है और बिना कुछ पाये यूं ही चला जाता है खाली हाथ ही ,,,, सीमा असीम  12,4,20  x
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ। अगर आप कोशिश करते हैं मेहनत करते हैं और अपना कर्म निरंतर करते हैं तो यकीन मानिए आपको अपने कर्म का फल अवश्य मिलेगा आप वो सब पा लोगे जो आपके मन में पाने की चाह है लेकिन सच्चे मन से अपने कर्म करने पर ही जैसे कबीर दास जी कहते हैं कि जो प्रयत्न करते हैं उनको अवश्य फल मिलता है जैसे खूब कड़ी मेहनत करने वाला गोताखोर बिना परवाह किए गहराई में गोता लगता है और कुछ न कुछ उसके हाथ जरूर लग जाता है लेकिन जो लोग डर के मारे किनारे पर ही बैठे रहते हैं वो बस बैठे ही रह जाते हैं और उनके हाथ कुछ लग नहीं पाता है .. सीमा असीम  11,4,20 
क्या कहिए उस बेअदब को  जिसे परवाह नहीं किसी अपने की ,,, जब बहते हैं मेरे आँसू  तब रो पड़ती है यह सारी कायनात  पशु पक्षी सब विचलित हो जाते हैं  बादल आकर बरसते हैं और  इन्द्र कुपित होकर ओले गिराते हैं  दहल जाता है धरती का सीना  आसमां भी कुपित हो जाता है  मेरी सच्चाई का मज़ाक बनाने वाले ओ मूर्ख इंसान  तू खुद ही अपने आप को गिरा लेता है  खुद की ही नजर में  कोई फायदा नहीं होगा तेरा  मुझे यूं दुख दर्द के सागर में गिराकर   तू छेंड देता है मेरी वही दुखती रग  जो तू सालों से घायल कर रहा है  जरा संभलता है दर्द कि  तू फिर से दुखा देता है  तुझे अभी चेत नहीं हुआ  क्या तू अभी भी नहीं समझा  क्या अभी भी शर्म से पानी पानी नहीं हुआ  क्या अभी भी तू अपनी ही नजरों में नहीं गिरा  ओ मूर्ख मानव तुझे अपनी करनी की सजा  अकेले नहीं भुगतनी पड़ रही बल्कि पूरा संसार भुगत रहा है  मूर्ख सुधार जा अभी भी वक्त है  मुझे इस तरह मत रुला  मत कर घायल अपने तीरों से  मत कर इतना  बेचैन कि  ...
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥ कबीर दास जी कितना सही कहते हैं कि हम अपना समय यूं ही व्यर्थ में बर्बाद कर देते हैं और फिर  दुखी होते हैं रात सोते हुए और दिन खाते हुए .....और हीरे जैसा अनमोल जन्म ऐसे ही सोते खाते बिता देते हैं और कौड़ी के भाव बना लेते हैं  सीमा असीम  6,4,20   
कबीर बादल प्रेम का , हम पर बरसा आई । अंतरि भीगी आतमा , हरी भई बनराई ॥         कहते हैं कि अगर एक बूंद भी मिल जाये तो अन्तर्मन तक पवित्र हो जाता है लेकिन प्रेम का मिलना इतना सरल नहीं है न ही इतना आसान है प्रेम को पा लेना ....बहुत मुश्किल है इस सफर में लेकिन सच्चे साधक चलते रहते हैं दुख भोगते रहते हैं लेकिन कभी अपनी राह नहीं बदलते   हैं तभी देखो कबीर जी क्या कहते हैं कि प्रेम का बादल मेरे ऊपर बरस रहा है जिस कारण मेरी अंतरात्मा तक पवित्र हो गयी है और प्रेम रस में तरबतर हो गयी है और मेरे आसपास का पूरा माहौल हरा भरा हो गया है ,, खुशियों से भर गया है ,,, यह अपूर्व और अद्भुत प्रेम के कारण ही तो हुआ है ,,,, हम सब इसी प्रेम में ही क्यों नहीं अपने जीवन को बिताते हैं क्यों इस प्रेम से वंचित रहते हैं सीमा असीम 5 ,4,20
हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध । कबीर परखै साध को ताका मता अगाध ॥ कबीर दास जी कितना सही कहते हैं कि असली हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है और कोई नहीं बाकी के लिए तो वो पत्थर के समान है और शब्दों को कोई सच्चा गुरु या सच्चा साधक ही जान सकता है बाकी तो सब खाली शब्द ही समझेंगे जैसे कबीर कहते हैं कि एक साधू ही असाधु को पहचान पाता है क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत गहन और गंभीर होती है ....सीमा असीम 4,4,20 
सुनो,  मेरे लबों पर मुस्कान है  और पाँवों में थिरक  चाँद खिला है  और चाँदनी बिखरी है  मन में भी उजाला चमक रहा  है और  अंधेरा कहीं दूर दुबक गया है  देखो कैसे पेड़ों पर छाई है हरियाली  कि धूप कुछ और चटख हुई जाती है  सच में मुझे अच्छा लगता है  तुम्हें याद करना और मन में मीठा दर्द जगा लेना  हाँ मुझे अच्छा लगता है तुम्हारा  झूठ बोल जाना  मैं जानती हूँ कि वो झूठ तुम मुझे नहीं खुद को बोलते हो  तब मैं और ज़ोर से मुसकुराती हूँ  तुम समझते हो न मुझे  कि मैं हूँ तुम्हारी नसों में लहू की तरह  और तुम मेरे रोम रोम में  धड़कते हुए  फिर कैसा सच और कैसा झूठ  कोई फर्क नहीं पड़ता है प्रिय  कभी भी नहीं  न पड़ेगा  जब जब कोई आया है हमारे बीच  हम दूर नहीं हुए  बल्कि और करीब आते गए  कि वो जो बीच में था न  न जाने कहाँ गुम गया  आया था तोड़ने  खुद टूट कर बिखर गया  क्योंकि अडिग विश्वास कभी कोई कैसे तोड़ देगा भला  सब टूट जाएगा  दुनिया खत्म हो जाएगी लेकिन...
सुनो        जब मैं तुम्हें याद करती हूँ  आँखें छलक पड़ती हैं  मैं चाहती हूँ मुसकुराना  पर नहीं मुस्कुरा पाती हूँ  मैं अपनी बाहें फैला कर  तुम्हें अपनी बाहों में भरने को  उतावली हो उठती हूँ अगर  कि तड़प उठता है दिल  रो पड़ता है दिल  क्यों सनम  क्या खता हुई है मुझसे  सिर्फ प्रेम ही तो किया  अगर प्रेम गुनाह है तो  किया है मैंने गुनाह  मानती हूँ अपने गुनाह को  लेकिन सुनो प्रिय  तुम भी बराबर के हकदार हो  मैं अकेली गुनहगार नहीं हूँ  तो सजा सिर्फ मुझे ही क्यों  दर्द आँसू , तड़प , बेचैनी सिर्फ मेरे लिए ही क्यों  शायद तुम भी बराबर के भागीदार हो  हाँ हो न  तुम भी तो पा रहे हो यही सजा  जो मुझे मुकरर्र कर दी गयी है  सीमा असीम  4,4 20 
कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास । काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास॥ कबीर दास जी कहते हैं कि यह ऊंचे भवन, महल , दुमहिले कोई भी काम नहीं आयेंगे क्योंकि जब यह गिर जाएँगे तब इनके ऊपर घास उग आयेगी, झाड झांघाड़ बस जायेगी इसलिए इन पर घमंड करो , गर्व मत करो , कभी अहंकार में मत पडो ,,,, वीराना सुनसान हो जाता है हँसता खिलखिलाता हुआ भी और आवाद भी हो जाता है मुस्कुरा उठता है मन जब गहरा सन्नाटा खत्म हो जाता है बस ....
एक पत्र प्रेमिका का            सुनो ,                       मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ ,हाँ मैं सच में यह जानना चाहती हूँ बार बार हर बार ,,,कि मैंने जब तुम्हें प्यार किया और सिर्फ तुम्हें प्यार किया तो तुम मुझे प्यार क्यों नहीं कर पाये सिर्फ मुझे ही , क्यों भटके और भटकते ही गए क्यों अपमान किया प्रेम का , क्यों आखिर क्यों , क्या पाना चाहते थे , जो मैं तुम्हें नहीं दे पाई ? जो मैं पूरा नहीं कर पाई ,,, तन मन धन से पूरी तरह समर्पण किया और तुम फ्री का समझ मुझे लौटते रहे , मेरे साथ खिलवाड़ करते रहे , क्यों खेलते रहे आखिर क्या मिला तुम्हें मुझे दुख देकर , मुझे तकलीफ में डाल कर , क्या तुम सुखी हो गए , तुम्हें खुशियाँ मिल गयी  ? कितना रुलाया मुझे , दिन रात , सुबह शाम , मैं सिर्फ रोती रही, तुम भी तो नहीं हंस पाये न , मनाते रहे, करते रहे उसकी खुशामदें , उसकी मन्नतें , लुटाते रहे अपनी दौलत, देते रहे उसे वो सब जिस पर उसका हक नहीं था ,, वो गालियां दे रही , वो बदनाम कर रही थी और तुम बिलकुल बेबस हो गए मैं कितनी...
कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ। बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ ॥ हमारा अहंकार, हमारा घमंड और हमारा गर्व हमें कभी अच्छा इंसान नहीं बनने देता ! जो व्यक्ति घमंड करता है उसे कभी भी कुछ प्रपट नहीं होता है और पाकर भी चला जाता है ! कबीर दास जी कितनी अच्छी बात कहते हैं कि चन्दन के पास नीम का पेड़ लगा हो तो वो भी चन्दन कि महक से महक उठता है लेकिन बांस का पेड़ अपने बड़ेपन या लंबाई के कारण डूब जाता है और कभी उठकर खड़ा नहीं हो पाता है वैसे ही हमें अपनी संगति से अच्छे प्रभावों को तो पा लेना चाहिए सिर्फ घमंड में रहकर गवन देने में क्या फाइदा होता है ! सीमा असीम  3,3,20  x
इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह। राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय॥ कितना सही कहा है कबीर दास जी ने कि यह दुनिया सिर्फ एक भ्रम है जिसके लिए हम न जाने कितनी नफ़रतें, लड़ाई, झगड़े करते हैं कि सब कुछ हमें मिल जाये या मेरे नाम हो जाये लेकिन हम यह नहीं जानते कि हमें अपना सब यहीं पर छोड़ कर जाना पड़ेगा कुछ भी हमाँरे साथ नहीं जायेगा, हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएँगे और हमें जाना ही पड़ेगा ,, यहाँ हम हमेशा नहीं रह सकते जैसे चाहें कोई राजा हो, छत्रपति हो, कोई भी क्यों न हो हमेशा यहाँ  के लिए नहीं आए हो और न ही कुछ ले कर जाओगे इसलिए अभी भी वक्त हो समझ जाओ और चेत जाओ ..... सीमा असीम  1,3,20  x