कितना कुछ कहना है मुझे तुमसे लेकिन
मैं कहाँ कुछ कह पाती हूँ
ये खामोशीयों मेरा मन मार देती है और
आँखों में भर जाते हैं अश्क
कैसे कह पाऊँगी अपने मन की सारी बाते , कैसे सुना पाऊँगी वे सब बातें जो मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कितनी मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजरती हूँ मैं किस तरह से खुद को कंट्रोल करती हूँ कैसे पता चलेगा तुम्हें कौन बताएगा और कैसे तुम जान पाओगे जो मैं कहना चाहती हूँ बार बार कहना और बताना चाहती हूँ कि कैसे तुमने वो सब किया होगा या कैसे तुम्हारी अंतरात्मा ने स्वीकार किया होगा किसी अन्य को हाथ से छु भी पाना ,,,
शायद यही नियति थी तुम्हारी गलती कैसे मान लूँ प्रिय कैसे मैं तुम्हें दोषी बना दूँ जबकि तुमने मुझे आज तक सच बताया तक नहीं बार बार पुछने पर भी और जब तुमने बताया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि तुम ऐसे हो सकते हो या ऐसा कर भी सकते हो , क्योंकि मैं तो तुमको एक सच्चा और अच्छा इंसान मानती हूँ ,,मुझे लगता है कि तुम खुदा आकर  भी कहे तब भी मैं इस बात को सच नहीं मानूँगी , हाँ नहीं मानूँगी इस बात को , कहने दो कोई कुछ भी कहता है , तुम सिर्फ मेरे हो सिर्फ मेरे मेरे अलावा तुम किसी के नहीं हो सकते कभी भी नहीं ख्वाब में भी नहीं माना कि जब तुम मेरे साथ नहीं हो या मेरे पास नहीं हो लेकिन हो सदा मेरे और इस बात को कोई भी गलत साबित नहीं कर सकता और मेरे विश्वास को नहीं तोड़ सकता ,, मुझे पता है कि सच यही है और मैं आजीवन यही लिखूँगी एक दिन यह सच हो जाएगा ,,,,
मेरी मांग का सिंदूर तुमसे है
और तुम ही हो मेरे माथे कि बिंदिया

सीमा असीम
17,12,19



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