तुझे पुकारूँ मैं और तेरा नाम ना लूँ यह कैसे हो सकता है
कि आओ या ना आओ यह सिर्फ तेरा ही काम है ॥
 हाँ मैं तुम्हें पुकारती हूँ दिन रात पुकारती हूँ और कभी धीरे कभी ज़ोर से नाम लेकर पुकारती हूँ और फिर अपने गले से लागकर हँसती गाती रोती हूँ लेकिन नहीं कह पाती हूँ कभी अपने मन की बातें अपने सुख अपने दुख अपने दर्द , मैं कहाँ कह पाती हूँ कभी कुछ भी, कभी नहीं कहा आज तक कि तुमने मुझे किस गलती की सजा दी किस बात के लिए इतने दुख दिये किस कमी के लिए कुछ और भटके नहीं पता मुझे कुछ भी बस इतना पता है कि मैं सिर्फ तुम्हारे अलावा कुछ और कभी सोच ही नहीं पाई ॥कहीं भी रहूँ या कुछ भी करूँ सिर्फ तुम ही ख्यालों या बातों में रहते हो क्या तुम्हें इस बात का अहसास नहीं होता अगर नहीं होता तो कोई बात नहीं शायद तुम इतने खुशकिस्मत नहीं हो कि तुम इन अहसासों को जी पाओ या महसूस कर पाओ क्योंकि यह देवीय अहसास हर किसी को नसीब नहीं होते हैं हर कोई इन्हें नहीं पा सकता <<<बिना किसी स्वार्थ के किसी को चाहना क्या इतना आसान है खुद को मिटा देना खत्म कर देना क्या इतना आसान है नहीं न ,,,हाँ
मुझे पता है मैंने जान बुझ कर मिटा लिया है खुद को ,,,,
मैं खुश हूँ कि मैं मैं रही ही नहीं
कि तुम्हें है अहसास तुम बनी हूँ मैं ,,,
सीमा असीम
13,12,19 

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद