मेरा ही मन कहीं मुझसे बगावत न कर ले
कि मैंने खुद को इतना खामोश कर लिया
हाँ सच में कुछ भी कहना नहीं चाहता है मेरा मन क्योंकि तुमने मेरी आत्मा को इतना कष्ट पहुंचाया है ,इतना दुख दिया है मेरी आत्मा को कि अब वो मुसकुराना भूल गयी है उसे अब याद नहीं आ रहा कि कैसे मुस्कुराए किस तरह तुम्हें माफ करे ,,तुम ऐसे आखिर हुए कैसे मैं तुमसे कभी कुछ कहना नहीं चाहती हाँ मैं तुम्हें तुम्हारी नजरों में गिराना नहीं चाहती नहीं चाहती वो सब बातें तुमसे कहना जिनसे तुम्हें दुख हो ,,क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि जो कुछ तुम करते हो उससे तुमने मुझे कितना दुख दिया है कितनी तकलीफ़ें दी हैं क्या तुम्हारी आत्मा मर चुकी है जैसे तुम्हारा जमीर मारा है उसी तरह से ,,सच में बहुत दुख होता है मुझे कि मैंने तुम जैसे शख्स पर अपना सब कुछ लूटा दिया और तुम्हारी आँखों में जरा सा पानी तक नहीं , इस तरह से भी कोई करता है क्या , क्या कोई ऐसा भी इंसान होता है , कैसे तुम खुद को ही आईने में देख पाते होगे ,कैसे खुद को सही पाते होगे , शायद तुम्हें खुद पर ही घिन आ जाती होगी , शायद तुम्हारा मन अपने लिए ही घृणा से भर जाता होगा ,हैं न ,,हाँ जरूर होता होगा, जरूर तुम्हारी आत्मा ही तुम्हें धिककारती होगी, तुम भी मेरी ही तरह से रो पड़ते होगे, तुम भी अपना दिल पकड़ कर बैठ जाते होगे ,निर्जीव बेजान से होकर रॉम रोम पुकारने लगता होगा मेरा नाम और तड़प जाते होगे , दर्द से भर ,,क्योंकि तुम मुझसे अलग नहीं हो सकते, तुम ऐसे हो या वैसे हो स्वीकार कर लेने में क्या हर्ज है ,तुम्हारी वे बातें मुझे दूसरों से सुनने को मिले तो तुम ही बता दो तुम कैसे मेरे हो कैसे , तुम्हें अगर मैं चाहती हूँ तो वैसा ही तुम्हें स्वीकार करूंगी जैसे तुम हो ,,,लेकिन तुम्हारे अंदर वो सब कहने कि शक्ति होनी चाहिए नाकि अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए और एक के बाद एक गलती करते जाना चाहिए ,,,सच में आज मैं शर्मिंदा हूँ , मेरी आत्मा को कष्ट है बहुत ज्यादा ,बेहद बेइंतिहा , काश तुम अभी भी एक सच्चे और अच्छे इंसान बन जाओ ,,,
दुख से भरी हूँ यह दुख जीने नहीं दे रहा
मारना था यूं तो सुख दिया क्यों था
सीमा असीम
14,12, 19
कि मैंने खुद को इतना खामोश कर लिया
हाँ सच में कुछ भी कहना नहीं चाहता है मेरा मन क्योंकि तुमने मेरी आत्मा को इतना कष्ट पहुंचाया है ,इतना दुख दिया है मेरी आत्मा को कि अब वो मुसकुराना भूल गयी है उसे अब याद नहीं आ रहा कि कैसे मुस्कुराए किस तरह तुम्हें माफ करे ,,तुम ऐसे आखिर हुए कैसे मैं तुमसे कभी कुछ कहना नहीं चाहती हाँ मैं तुम्हें तुम्हारी नजरों में गिराना नहीं चाहती नहीं चाहती वो सब बातें तुमसे कहना जिनसे तुम्हें दुख हो ,,क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि जो कुछ तुम करते हो उससे तुमने मुझे कितना दुख दिया है कितनी तकलीफ़ें दी हैं क्या तुम्हारी आत्मा मर चुकी है जैसे तुम्हारा जमीर मारा है उसी तरह से ,,सच में बहुत दुख होता है मुझे कि मैंने तुम जैसे शख्स पर अपना सब कुछ लूटा दिया और तुम्हारी आँखों में जरा सा पानी तक नहीं , इस तरह से भी कोई करता है क्या , क्या कोई ऐसा भी इंसान होता है , कैसे तुम खुद को ही आईने में देख पाते होगे ,कैसे खुद को सही पाते होगे , शायद तुम्हें खुद पर ही घिन आ जाती होगी , शायद तुम्हारा मन अपने लिए ही घृणा से भर जाता होगा ,हैं न ,,हाँ जरूर होता होगा, जरूर तुम्हारी आत्मा ही तुम्हें धिककारती होगी, तुम भी मेरी ही तरह से रो पड़ते होगे, तुम भी अपना दिल पकड़ कर बैठ जाते होगे ,निर्जीव बेजान से होकर रॉम रोम पुकारने लगता होगा मेरा नाम और तड़प जाते होगे , दर्द से भर ,,क्योंकि तुम मुझसे अलग नहीं हो सकते, तुम ऐसे हो या वैसे हो स्वीकार कर लेने में क्या हर्ज है ,तुम्हारी वे बातें मुझे दूसरों से सुनने को मिले तो तुम ही बता दो तुम कैसे मेरे हो कैसे , तुम्हें अगर मैं चाहती हूँ तो वैसा ही तुम्हें स्वीकार करूंगी जैसे तुम हो ,,,लेकिन तुम्हारे अंदर वो सब कहने कि शक्ति होनी चाहिए नाकि अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए और एक के बाद एक गलती करते जाना चाहिए ,,,सच में आज मैं शर्मिंदा हूँ , मेरी आत्मा को कष्ट है बहुत ज्यादा ,बेहद बेइंतिहा , काश तुम अभी भी एक सच्चे और अच्छे इंसान बन जाओ ,,,
दुख से भरी हूँ यह दुख जीने नहीं दे रहा
मारना था यूं तो सुख दिया क्यों था
सीमा असीम
14,12, 19
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