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राग बहार बजता है मेरे भीतर
अनवरत
सुख, दुःख, धूप छाँव
रोने हँसने औ
हर मौसम में
तेज़ हवायें जब मेरे मन को
झकझोरती हैं
तब खामोशियों के बीच
ऋतुये चहचहाने लगती हैं
गौरैया सी
और समस्त पृथ्वी मानों परिक्रमा करने लगती है
मेरे चारो ओर
क्योंकि जी रही हूँ
स्वार्थ से परे
सिर्फ़ सच को !

सीमा असीम 
18,12 19 

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