उदासियाँ कभी अकेली नहीं होती
कि साथ हो तुम मेरे उदासी में ,,,
कहने के लिए कोई शब्दों की जरूरत नहीं होती है जब बातें करता रहता है मेरा मन हरदम तुमसे बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले सब कह आता है सब सुन आता है सब समझ आता है मुझे बिना कहे सुने भी शायद तुम नहीं समझ पाते होगे , शायद तुम्हें पता नहीं चल पता होगा या शायद नहीं सुन पाते होगे मेरी आवाज ,,हाँ कुछ भी हो सकता है न , कहाँ हमारे वश में होती है हमारी परिस्थितियाँ ,हैं न , हम वक्त के गुलाम होते है न , लेकिन यह सब गलत बातें हम जो कुछ भी करते हैं या जो हमारे साथ हो रहा होता है उसमें परिस्थिति से ज्यादा हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं हम अपने साथ जो कुछ भी करते हैं सोच समझ लेते हैं तब ही करते हैं लेकिन प्रेम हम सोच समझ कर नहीं करते हैं , प्रेम तो हो जाता है और जब प्रेम हो जाता है तो हमें अपना प्रेमी ईश्वर के रूप में नजर आने लगता है और उसे ईश्वर की तरह मान सम्मान देने लगते हैं , इन सब बातों से बेखबर होकर कि जिसे हम चाहते हैं और जिसके प्रति समर्पित हैं वो सिर्फ हमारी भावनाओं का फायदा उठाने के लिए हमें और हमारे प्रेम को छल तो नहीं रहा , हमें मात्र एक वस्तु समझ कर हमारा इस्तेमाल तो नहीं कर रहा , शायद जब हम प्रेम में होते हैं तब हम सिर्फ अपने प्रेमी कि खुशी चाहते हैं वो गलत कर रहा है या सही कर रहा है हम सच में कुछ नहीं जान और समझ पाते हैं या हम सच में कुछ जानना समझना चाहते ही कब हैं लेकिन जब हम किसी को चाहते हैं तो उसे हमारे प्रेम की हमारे समर्पण की कदर करनी चाहिए , प्रेम को सारे बाजार नहीं करना चाहिए ,उस प्रेम की गरिमा बनाए रखनी चाहिए जिससे प्रेम को व्यभिचार का नाम न देना पड जाये ,,,
क्या कहूँ मैं खुद के लिए कि
बेजान सा जिस्म है दिल में बेचैनी ,,,
सीमा असीम
15,12,19
कि साथ हो तुम मेरे उदासी में ,,,
कहने के लिए कोई शब्दों की जरूरत नहीं होती है जब बातें करता रहता है मेरा मन हरदम तुमसे बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले सब कह आता है सब सुन आता है सब समझ आता है मुझे बिना कहे सुने भी शायद तुम नहीं समझ पाते होगे , शायद तुम्हें पता नहीं चल पता होगा या शायद नहीं सुन पाते होगे मेरी आवाज ,,हाँ कुछ भी हो सकता है न , कहाँ हमारे वश में होती है हमारी परिस्थितियाँ ,हैं न , हम वक्त के गुलाम होते है न , लेकिन यह सब गलत बातें हम जो कुछ भी करते हैं या जो हमारे साथ हो रहा होता है उसमें परिस्थिति से ज्यादा हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं हम अपने साथ जो कुछ भी करते हैं सोच समझ लेते हैं तब ही करते हैं लेकिन प्रेम हम सोच समझ कर नहीं करते हैं , प्रेम तो हो जाता है और जब प्रेम हो जाता है तो हमें अपना प्रेमी ईश्वर के रूप में नजर आने लगता है और उसे ईश्वर की तरह मान सम्मान देने लगते हैं , इन सब बातों से बेखबर होकर कि जिसे हम चाहते हैं और जिसके प्रति समर्पित हैं वो सिर्फ हमारी भावनाओं का फायदा उठाने के लिए हमें और हमारे प्रेम को छल तो नहीं रहा , हमें मात्र एक वस्तु समझ कर हमारा इस्तेमाल तो नहीं कर रहा , शायद जब हम प्रेम में होते हैं तब हम सिर्फ अपने प्रेमी कि खुशी चाहते हैं वो गलत कर रहा है या सही कर रहा है हम सच में कुछ नहीं जान और समझ पाते हैं या हम सच में कुछ जानना समझना चाहते ही कब हैं लेकिन जब हम किसी को चाहते हैं तो उसे हमारे प्रेम की हमारे समर्पण की कदर करनी चाहिए , प्रेम को सारे बाजार नहीं करना चाहिए ,उस प्रेम की गरिमा बनाए रखनी चाहिए जिससे प्रेम को व्यभिचार का नाम न देना पड जाये ,,,
क्या कहूँ मैं खुद के लिए कि
बेजान सा जिस्म है दिल में बेचैनी ,,,
सीमा असीम
15,12,19
Comments
Post a Comment