कैसे कह दूँ आकाश में कोहरा घना है
हाँ मैं कैसे कह दूँ तुमसे तुम्हारी ही कमियाँ
लेकिन है तो हैं जो सच है उसे झूठ कैसे कहा जा सकता है और जो झूठ है वो सच कैसे हो सकता है , जो है उसे स्वीकार कर लेना ही सही है कहाँ तक रोया जाये या खुद को सजा दी जाये ।खुद को चोट पहुंचा कर , खुद को ही तकलीफ देकर तुम्हारी गलती को मैं भुगतती राहून कितना कष्ट दूँ मैं खुद को , किस गुनाह की सजा दूँ मैं या देती रहूँ , मैं बस इतना जानती हूँ हर चीज का हर बात का एक वक्त होता है अगर वक्त गया है तो आ भी जाएगा फिर से आएगा और पहले से कहीं बेहतर आयेगा , मैं तो इस बात की हैरत मानती हूँ कि तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ,हो सकता है यही तुम्हारा धंधा हा हो ॥ खैर जाने दो बना लो मेरे खराब वक्त की मजाक , मुझे लगता है यही मेरा सबसे अच्छा वक्त ले आएगा , हँसता मुसकुराता और गीत गाता हुआ झूम कर नाचता हुआ जब हम साथ होंगे आपस में बात करते हुए क्योंकि मुझे पता है सच हमेशा सच रहता है न उसकी जीत होती है और न उसकी हार होती है .....
सुख की नदी फिर से लहलहायेगी
देखना मेरे लबों पर मुस्कान थिरक जाएगी
हाँ तुम हो सिर्फ मेरे ही सिर्फ मेरे ,,,,,

सीमा असीम
23,12,19 

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