कोई चाह नहीं है लेकिन बेइंतिहाँ  चाहत है मन में
 सिर्फ तुम्हारे लिए और सिर्फ तुम ही हो
क्या कहना है और क्या कहना चाहती हूँ शायद तुम समझ जाते हो बस इसीलिए ही मैं तुमसे कुछ भी कहना नहीं चाहती ,,पर सच कहुंतों सच सिर्फ यह है कि मेरी आँसू बहने शुरू हो जाते हैं और मेरा जिस्म बेजान हो जाता है ,,ना जाने कहाँ चली जाती है मेरे शरीर की जान , सनम क्या कहूँ मैं ,,क्या तुम सच में समझ जाते हो न ,, पता है न तुमको कि जबसे मांगा है सिर्फ तुम्हें ही मांगा है और कोई मांग नहीं है मन में ,,,जबसे चाहा है सिर्फ तुम्हें ही चाहा है ,, बस एक ही ख़्वाहिश है और कोई ख़्वाहिश नहीं है मेरी ॥ इतने शब्द मेरे मन में समा गए हैं लेकिन मैं निशब्द हो गयी हूँ कुछ कहने को जुबां खामोश हो गयी है और आँखों में इतनी मनी भर गयी है कि बस जरा सा दिल भरा और अश्क छलक जाते हैं बस मैं नहीं जानती ऐसा क्यों है पर यही सच है सिर्फ यही सच है कि तुम सिर्फ मेरे हो सिर्फ मेरे ,,,,,

तुम्हें किस भाषा में कहूँ कि हर भाषा मौन हुई है
तुम मौन को मेरी कोई भाषा दे दो कोई जुबां दे दो ,,,

सीमा असीम
29 , 12, 19

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