कि जब तुम्हें मैं याद करती हूँ
कि मैं तुम्हें कब याद नहीं करती ...

जब कभी पल भर को भी तुम्हें भूलना चाहता है मेरा मन कि उसी पल फिर से तुम्हें याद करना चाहता है मेरा मन ,,,खूबसूरत पलों को पलकों में बंद करके जब मैं देर तक सोचती हूँ तो मन कभी व्याकुल हो उठता है और कभी खुशी से झूम उठता है आखिर मन ही तो है और मन के बारे में कैसे जाना जा सकता है और जिसने मन की महिमा को जान लिया वो जीत गया खुद से भी और अपने मन से भी की जीतने के लिए और क्या चाहिए कुछ भी तो नहीं सिवाय आत्मविश्वास के या मन के विश्वास के ......
भ्रम में जीना जिंदगी तो है पर एक सपना है और सपना कभी अपना नहीं होता वो सिर्फ राह दिखा सकता है लेकिन अपना हमेशा अपना ही रहता है किसी भी मुश्किल में साथ खड़ा होता है उसे किसी तरह से अपना नहीं बनाना पड़ता है क्योंकि अपनों के हमारे मन से तार जुड़े होते हैं वे न तो कभी उलझते हैं और न कभी सुलझाने पड़ते हैं वे तो हमेशा मन के महीन तर से जुड़े होते हैं आखिर वे हमारे अपने होते हैं जिनको हमारी परवाह होती है हमारे सुख और दुख की हमारी खुशी और सुख में वे भले ही न साथ हो लेकिन हमारे दुख में सदा किसी मजबूत सहारे की तरह साथ में होते हैं किसी परछाईं की तरह साथ होते हैं ,,,दुनिया अपनों से ही गुलजार होती है गर न हमारे अपने तो कैसे जिये कोई ....
सीमा असीम
21,12,19 

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