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Showing posts from January, 2018
कि यह प्यार है गिला नहीं  सुनो प्रिय             तुम्हें देखते ही न जाने कितना प्रेम उमड़ पड़ता है जो मन में भरा होता है न उसे सब तुम्हारे ऊपर उड़ेल देने को जी चाहता है तुम यूं ही सामने बैठे रहो पल भर को भी तुमसे दूर जाने का दिल ही  नहीं करता है ,,,,लेकिन मैं तुम्हें अपनी नजरों से दिल में बसाकर एक बार फिर दूर हो जाती हूँ पर दूर जाकर भी कहाँ दूर जा पाती हूँ बल्कि और ज्यादा करीब आ जाती हूँ बेहद करीब इतना कि तुम मेरी साँसों में रहने लगते हो तभी तो तुम हो तो हम हैं अन्यथा हमारा होना कोई होना नहीं है ,,, हर पल तुम्हारी आरजू रहती है न जाने यह कैसी बेकरारी है जो न कही जाती है और न ही सही जाती है,,,तभी तो मैं रचती रहती हूँ तुम्हें ही शब्द दर शब्द,, अपनी गजल में गीत में कहानी में और कविता में यकीनन बहुत ही मुश्किल है तुम्हारे बिना जीना, रहना ,,, प्रिय यूं ही तुम्हें चाहते रहेंगे ...मिटते रहेंगे .... प्रिय मेरी जो यह मोहब्बत है न इसकी कभी थाह लेने कि कोशिश मत करना क्योंकि यह अथाह है जितना लुटाती हूँ उतनी ही और ज्यादा उमड़ने लगती है ,,सागर कि लहरे त...
आज मैं बहुत दिनों के बाद घर से निकली ! न जाने यह क्या हुआ है मैं खुद को जी ही नहीं पाती हूँ तुम्हें ही जीती रहती हूँ और न जाने यह हो कैसे जाता है कि मुझे तुम्हारे किसी भी सुख या दुख के बारे में पता कैसे चल जाता है ! न जाने कौन सी वो अद्रश्य सी डोरी है जो मुझे हर पल तुम्हारी तरफ खींचती रहती है !तुमसे बात हुई और सारे दुख दूर भाग गए मैं मुस्करा दी और आँसू न जाने कहाँ उड गए 1 कितनी बीमार थी वो बीमारी भी फुर्र से कहीं गायब हो गयी !   मेरे प्रेम के सच्चे सहचर प्रिय आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ,, सुनोगे न ? वो जो मेरा प्रेम का मंदिर है न उसका मान बनाए रखना ! बस इतना ही कहना है कि उसे अपवित्र मत होने देना क्योंकि वहाँ उसकी रक्षा चारो तरफ से घेरे खड़े मेरे भाई देव उसकी पहरेदारी कर रहे हैं ! और साक्षात ईश्वर हमें आशीर्वाद देने को तत्पर हैं साथ ही माँ प्रकृति अपना आँचल बिछाए हमें सुख की सकूँ की छांव दे रही है ! सुनो नाराज मत होना !  मुस्करा दो न ?  बस एक बार ज़ोर से खिलखिला कर, कि उस मुस्कान की खुशी मेरे चेहरे तक आ जाये !  तो मुस्कराओ ??
वो लड़की सुना तुमने ? दामोदर बाबू की लड़की भाग गई।’’ ‘‘कौन? बड़ी वाली?’’ ‘‘पता नहीें, तीनों की तीनों तो कठैला जवान थीं।’’ ‘‘जब कोई पच्चीस बरस तक कुँवारी पठिया घर में बाँधे रहे, तो भागेगी नहीं? घास खानेवाली बकरी तो छह महीने में ही मिमियाने लगती है।….कुछ पता चला, किसके साथ भागी है?’’ ‘‘मुहल्ले के सारे परवाज तो वहीं हैं।’’ ‘‘लौडिया तो छुपा रुस्तम निकली!’’ ‘‘बेचारे दामोदर बाबू की इज्जत धूल में मिल गई। भागी तो वह थी दो दिन पहले, लेकिन बात आज खुली है।’’ ‘‘यह चिड़िया तो तुम्हारे पड़ोस की थीं। तुमने दाना नहीं डाला?’’ ‘‘यार, वह तो किसी की मुँडेर पर बैठती ही नहीं थी। जाने कैसे किसके जाल में फँस गई।’’ ‘‘रत्तो ! दामोदर की बेटी ने तो हद कर दी। बाप की पगड़ी का जरा भी खयाल नहीं रखा। तुम्हारी सोनी तो बीस पार कर रही है। जरा नजर रखियो। जमाना जाने कैसा हो रहा है!’’ ‘‘ दीदी, जमाने को तो खराब कर रखा है इन सिनेमावालों ने। यथार्थ-चित्रण के नाम पर पर्दे पर ऐसी-ऐसी हरकतें होती हैं कि….और वही उल्लंग लपक-चिपक दुहराई  जाती है टी.वी. के पर्दे पर भी।’’ ‘‘हाँ, उससे जवान लड़के-लड़कियों का ...
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछुड़े पियारे  उन्हीं से नेह लगा है हमन को बेकरारी क्या !! सुनो प्रिय                ये जो पल पल तुमसे बात करती रहती हूँ न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे दिल में कुछ फंस सा गया है गले में कुछ अटक सा गया है और जुबान कुछ कहते कहते अटक सी गई है फिर भी मैं तुमसे कहती रहती हूँ कुछ न कुछ और तुम सुनते रहते हो यूं ही चुपचाप बैठे हुए और कभी तुम कहते हो तो मैं तुम्हें अपलक देखती रहती हूँ मुस्कराते हुए लेकिन प्रिय ये हंसने  खिलखिलाने के दिन बड़ी जल्दी से निकल जाते हैं न बचे रह जाते हैं तो सिर्फ आँखों में आँसू ,,,, जो नम किए रहते हैं मेरा मन  ,,,,,,जब मैं बेचैन होती हूँ तो मेरे मन सिर्फ इतना सा ख्याल आता है कि तुम खुश तो हो न ,,,,,कहीं कोई तकलीफ तो नहीं .......न जाने कैसी बेबसी सी है जो कुछ कुछ मन पर छाई हुई है इन दिनों ॥....मेरे प्रिय मुझे याद आता कि वो तुम्हारा सिगरेट के काश लेते हुए आधी सिगरेट को यूं ही सुलगते हुए फेंक देना कितनी देर तक वो यूं ही सुलगती रहती होगी ? न जाने कितनी देर ...
चाँद के आने से जो हल्की सी मुस्कान की रेखा आती है  बस वही तो जिंदगी है, हाँ सिर्फ उतनी सी ही जिंदगी है !! सुनो प्रिय,             जब मैं तुम्हें उकेरने लगती हूँ तब वो रब स्वयं आकर मेरी सामने बैठ जाते हैं मंद मंद मुस्कराते हुए और मैं रचने लगती हूँ एक विलक्षण संसार जहां तुम होते हो मैं होती हूँ और होता है .........तुम और मैं मिलकर बन जाता है हम .........वहाँ सिर्फ हम होते हैं न्सिर्फ हम ,,,,,,,ओ मेरे प्रिय ,मेरे दिल पर एकक्षत्र राज करने वाले चाँद  जब तुम चंद पलों के लिए आसमा में आ जाते हो न तो पूरी धरती उस रोशनी से चमक उठती है ....अंधेरी रात में कोहरे में छुपे रात्रि के वे पल स्वयं पर गर्व कर उठते हैं और पल भर को तो मानों ये धरती ये आसमा ये रात का समय सब कुछ ठहर जाता है .....थिर हो जाता है ...और सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही पुष्प वर्षा करने लगता है और उस सुगंध से महमहा उठता है पूरा वातावरण ......मैं बावरी सी होकर सिमट जाती हूँ खुद की ही बाहों में .... ये सच है कि मुझे प्रेम है तुमसे सच्चा प्रेम ....ये दिल की लगी है कोई दिल्ल...
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आपका नाम ले लेकर हमने अपनी रातों को संवारा है  कभी गुजारा है अमावस्या की रात को चाँद की राह में !! सुनो प्रिय,               रात तो गुजर गयी रोशनी की एक चमक के लिए क्योंकि  अमावस्या की रात चाँद आसमा में आता ही नहीं ! न गीत रचे जाते हैं न कोई रचना बस इंतजार होता है सुबह की पहली किरण का ! सर्दियों की रातें यूं ही बहुत अधेरी और सर्द होती हैं !    एक झलक चाँद की पाने भर से ही शरीर में कुछ गर्माहट का अहसास होता है ! लेकिन प्रिय आज रात भर मन बहुत ही बेचैनी से भरा रहा कि जब चाँद आसमा में नहीं आता है तो वो कितना परेशान हो जाता होगा ...हद से ज्यादा मुस्कराता होगा ......अपने गम छुपाने के लिए ........प्रिय आप जानते हो न कि तन्हाइयाँ बहुत दर्द देती हैं ...बहुत तकलीफ से भर देती है ......लेकिन उस वक्त हम यह कैसे भूल जाते हैं कि वो भी तो इतना ही उदास और तन्हा होंगे .....हाँ प्रिय यही सच है कि हम अपने स्वार्थ में अंधे होकर सिर्फ अपने दुखों को दर्द को लेकर बेचैन होते हैं रोते हैं लेकिन हम आपका गम आपका दर्द आपकी ...
दिल की अतल गहराईयों में तुम्हें बसा लिया है रग रग में सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम लिख लिया है ज़रूरत नहीं रही दुनियाँबी दिखावे की मुझे इस तरह चाहा और तुम्हें अपना बना लिया है मिटाया है मैनें ख़ुद को तेरी चाहत में सनम आँखों में बस तेरा ही अक्स बसा लिया है जाओगे भला कैसे तुम मुझसे दूर होकर इस तरह से मन से मन को मिला लिया है ! ! सीमा असीम
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seema aseem तुम मेरे मन में शोर मचाते हो चीखते हो चिल्लाते हो घमासान सा मचा देते हो भीतर से पिघलाते हो और आँखों से वाष्प बन कर बहा देते हो इतना बेचैनी से भर देते हो कि सारा चैन खो जाता है सारा सकूं चला जाता है घबरा जाती हूँ मैं उदासियों को समेट कर अपने आसपास उनसे लिपट कर पूरी दुनियाँ को भूल जाती हूँ उनसे ही करके अपना शृंगार एक बेजान जिस्म में तब्दील हो जाती हूँ बेजान बन जाती हूँ ! ! सीमा असीम
मैं कोमल डाली सी झुक जाती हूँ तुम और झुका देते हो मैं फ़िर कुछ और झुक जाती हूँ तुम बार बार झुकाते जाते हो आखिर कितना झुकाओगे मुझे मैं तिनका तिनका होकर बिखर जाऊँगी बिखरती तो अभी भी हूँ समेट लेती हूँ ख़ुद को ख़ुद ही ज़्यादा तोड़ा तो कहीं की नहीं रह पाऊंगी हाँ मिट जाऊँगी और प्रीत अपनी अमर कर जाऊँगी प्रेम को अमर कर जाऊँगी सदा सदा के लिये ! सीमा असीम
चिड़ियाँ सा चहचहाता है मन कभी और कभी उदास हो डाली को चोंच सा कुरेदता है मन बैठ जाता है उदास निराशा होकर चोंच में पकड़े दाने को गिरा देता है जमीं पर एकटक एक ही दिशा में निहारता है मन क्यों ले गया उड़ा के कोई मन क्यों कार दिया बेजान बेजार मन क्यों घूमता है बावला सा होकर मन घोंसले के तिनकों को चोंच से नोचते हुए हताश चिड़िया सा मन तुम्हारी राह देखता हुआ ! ! ! सीमा असीम
बहुत प्यार है न तुम्हें पौधों से पेड़ों से रोपते रहते हो उन्हें यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ सींचते भी हो न प्रेम भरे स्पर्श से सहला भी देते हो फल फूल पत्ती डाली सबको निहारते हो न दुलार से बहुत प्रेम है तुम्हें प्रकृति से प्रेमिका की तरह कोमल हृदय भी हो तो क्यों हो जाते हो कठोर क्यों नहीं कभी मेरा ख़याल जो तुम्हें मानती है अपना प्रेमी करती हूँ सच्चे दिल से तुम्हारी परवाह बार देती हूँ अपना सबकुछ तुम्हारी ख़ुशी के लिये क्या तुम्हें ज़रा भी फ़िक्र नहीं होती ? ? सीमा असीम
मेरी आँखों में आँसू है डबाडब भरे हुए और मन में बेइंतिहा उदासी पल पल तुम्हारी याद मुझे जीने नहीं दें रही कैसे सब्र का दामन पकड़ूं ऐसा लगता है सब्र ही मुझसे रूठ गया है जैसे किसी मासूम बच्चे की तरह से जो मुँह फुला लेता है या रो रो कर घर भर देता है अपनी मनपसंद चीज़ न मिलने पर मैं चाहत की डोर से बँधी खिंची चली आती हूँ और तुम यूँ ही बाद में याद करना ही भूल जाते हो सुनो प्रिय तुम आ जाना जब सर्दियां कुछ कम हो जायें आ ज़रूर जाना तुम मैं तुम्हारे इंतज़ार में बैठी हूँ पल पल में अश्रु बहाते हुए ! ! सीमा असीम
मेरे ढलकते हुए आँसूओं की एक एक बूँद पर तुम्हारा अक्स उभर आया है और बिखर गय है मेरे अंग अंग पर रोम रोम पर मेरे आसपास देखने लगा है मुझे प्रेम से निहारता हुआ मेरे व्याकुलता से भरे मन को दिलासा देता हुआ मैं अपनी घबराहट छुपा कर पूछने लगती हूँ तुमसे एक बात पिया कहीं तुम्हें मेरी याद तो नहीं आती कहीं तुम भी बेचैनी से तो नहीं भर जाते कहीं तुम भी तो बावला बनकर मुझे तो नहीं पुकारते कहीं तुम भी रात को करवटें बदलते हुए रात तो नहीं गुजारते प्रिय तुम ध्यान से सुनना मेरी बात मैं ख़ुश हूँ हर परवाह से बेपरवाह होकर कि सर्दियां बहुत हैं सो ठंड बहुत लगती है बस बाकी सब सही है मैं ठीक हूँ धूप अब तेज़ होकर बिखरने जो लगी है न ! ! सीमा असीम
बहुत ही मंथर गति से चलते हुए उसके कदम आगे बढ्ने से इंकार कर रहे थे , मन कितना भारी हो रहा था और आँखों से आँसू स्वतः बहते  जा रहे थे, मैं एक बार फिर से दौड़ कर उनके गले लग जाना चाहती थी ॥ मैंने देखा वे भी अपना बेग खींचते हुए चले जा रहे थे उनके कदमों में वो पहले जैसी रवानगी नहीं थी बड़े मंद मंद चलते हुए चले जा रहे थे हाँ वे देख सामने की तरफ रहे थे और मैं उनकी तरफ ! इतने हल्के कदमों से तो वे कभी भी नहीं चलते हैं ! मैं ठिठक कर उन्हें जाते हुए देखने लगी, एक हाथ कोट की जेब में और दूसरे में ट्रॉली बैग का हेंडल !  वे जा नहीं रहे थे बल्कि मेरे दिल में मन में और गहरे उतरते चले जा रहे थे ऐसा लग रहा था वे आ रहे हैं अपने मन से मेरे मन तक ! सिर्फ एक लालच कि वे पलट कर देखेंगे मुझे और इसी तरह टकटकी लगाए लगातार देखती रही जब तक वे आँखों से ओझल न हो गए ! अभी अभी तो हाथ मिलाया था गले से लगाया था कितना भर आया था मन बिना किसी वादे के हम मिलकर जुदा हो गए ! वैसे हम जुदा होकर भी जुदा कहाँ हुए थे कोई हमें जुदा कैसे कर पगा जब हमारे मन और प्राण एक हो चुके हैं ! मैंने भारी मन से अपना बैग उठाया और सीढ़ियाँ...
रात गुजरी नहीं नींद आयी नहीं कब पलकें झुकी नहीं है पता संग तेरा प्रिय साथ तेरा प्रिय कब नज़रें मिली नहीं है पता पास तुम हो नहीं दूर फ़िर भी नहीं कब धड़कने जुड़ी नहीं है पता गीत गाये नहीं राग साधे नहीं कब तारें सधी नहीं है पता प्रेम तुम हो प्रीत तुम हो कब हारे हम नहीं है पता ! ! असीम
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seema aseem कविता आपके पास मैं आ जाती हूँ मन वही रह जाता है मैं चली आती हूँ जान वही रह जाती है बिना जान का जिस्म बिना मन की मैं पल पल तुम्हें पुकारती हूँ बाबरी सी बन हर जगह तुम्हें तलाशती हूँ रात को सोना एक बहाना होता है असल में तुम्हारा ख्वाबों में आने की चाहत लिये पलकें बंद कर लेती हूँ, तुम्हें अपनी बाहों में समेटने की चाहत, तुम्हें अपने गले लगाकर चूमने का मन बढ़ी हुईं धड़कने कैसे शोर मचाती हैं ठहरती ही नहीं प्रिय अब तुम ही बताओ क्यों धड़कता है दिल ? क्यों पुकारता है मन ? क्यों रोती हैं आँखें ? क्यों तलाशती हूँ तुम्हें ? क्या तुम्हारा होना ही काफ़ी नहीं है क्या तुम्हें अपना वजूद बना लेना ही बहुत नहीं है तो कैसा रोना, मचलना, तड़पना, पुकारना और ढूंढना, तलाशना ? ? सीमा असीम
गतांक से आगे ओ रे साजन याद मे तेरी यूं भुलाया है खुद को रात जाती है बात पर कभी जाती नहीं है !1 सुनो प्रिय,      जो मैं तुम्हें लिखती हूँ न जाने क्यों रचती हूँ यह जान कर  भी कि कोई मतलब ही नहीं है मेरे इन  अल्फ़ाजों का, मेरी बातों का ........प्रिय बहुत कोमल है, बहुत नाजुक है, मेरा प्रेम.... जरा सी बात पर मुरझाने सा लगता है ....मलिन सा होने लगता है....प्रिय आपकी याद में ही गुजर जाते हैं मेरे रात दिन, पल छिन .....लेकिन ये दो दिन न जाने क्या हुआ ...न जाने कितनी बेचैनी ...कितनी परेशानी ....कितनी तकलीफ थी ...समझ ही नहीं आ रहा था ...कुछ किया ही नहीं जा रहा था ....न जाने आपकी किस परेशानी में मन घुला जा रहा था ...पल भर को भी चैन नहीं आ रहा था .....भूख प्यास नींद सब भुला कर मैं बस तुम्हें ही ताक रही थी .....तुम्हारी उस चमकती हुई रोशनी में खोई हुई थी ...प्रिय तुम सच बताना क्या तुम्हें भी वही सब अहसास होता है जो मैं महसूस करती हूँ ...प्रिय  जिस्म से गर जान जुदा कर दी जाये तो वो जिस्म कैसे चलेगा .....कैसे सांस लेगा ...कैसे कोई और काम करेगा ॥...॥ प्रिय सच में बेहद क...
तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया बाहों मे छुपा के ये क्या किया ओ रे पिया ओ तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया पास बुला के, गले से लगा के तूने तो बदल डाली दुनिया नये है नज़ारे, नये है इशारे रही ना वो कल वाली दुनिया पास बुला के, गले से लगा के तूने तो बदल डाली दुनिया नये है नज़ारे, नये है इशारे रही ना वो कल वाली दुनिया सपने दिखा के तूने ये क्या किया ओ रे पिया ओ तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया ओ मेरे साजन कैसी ये धड़कन शोर मचाने लगी मॅन मे जैसे लहराए नदिया का पानी लहर उठे रे मेरे तन मे ओ मेरे साजन कैसी ये धड़कन शोर मचाने लगी मॅन मे जैसे लहराए नदिया का पानी लहर उठे रे मेरे तन मे मुझ मे समा के ये क्या किया ओ रे पिया ओ तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया बाहों मे छुपा के ये क्या किया ओ रे पिया ओ तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया पिया पिया बोले मतवाला जिया
गतांक से आगे  ये बंधन तो प्यार का बंधन है जन्मों का संगम है सुनो मेरे प्यारे प्रियतम,                           सच एक ही होता है सबका, किसी के भी कई सच नहीं हो सकते हैं न प्रिय ? मेरा भी एक ही सच है सिर्फ एक सच ,,,, तुम समझते हो न फिर क्यों इधर उधर की बातों से भटकाना चाहते हो ? क्यों भ्रम को बढ़ाना चाहते हो ? क्यों करना चाहते हो ऐसा कि मैं मुस्कराना ही भूल जाऊँ ....भूल जाऊँ मैं जीना ..... प्रिय आसमान मे टंगे उस पूर्णिमा के पूरे चाँद को संग संग देखा था हमने, एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले हुए ,,,,मैंने उंगली दिखाते हुए कहा, देखो, ये हमारे प्रेम का साक्षी है न , तो तुम मुस्करा दिये थे ,,,,उस मुस्कान को कैद कर लिया था हमने जेहन में, सुनओ प्रिय अब जब कभी भी हम चाँद देखेंगे तब तुम वहाँ मुसकराना और हम यहाँ मुस्कराएँगे ........फिर आगे बढ़कर आरलिंगन में भरकर वो एक दूसरे को चूम लेना प्रिय क्या ये सच नहीं है ? क्या यह हमारे सच्चे प्रेम का सच्चा प्रतीक नहीं है?   प्रिय कितनी बातें जो तुम कर रहे थे, मैं सुन र...
गतांक से आगे रंगीला रे तेरे रंग में रंगा है मेरा तन मन सुनो प्रिय                कितनी जल्दी गुजर जाते हैं न ये खुशी भरे दिन ,,, पता ही नहीं चलता कब आए और कब गुजर गए ,,,,कितनी सारी खुशियाँ भर देते हैं दामन में और आँखों में छलक्ते आंसुओं से हमें अमीर कर देते हैं ...कैसे पल पल तुम्हें छूने की चाह ,,,,कैसे तुम्हें अपनी बाहों में भर लेने की आकुलता ,,,कैसे तुम्हें खुद में समा लिया ...कैसे तुम्हें ही अपना अस्तित्व बना लिया ...तुम मेरा वजूद सा बन गए हो । ,कैसी घबराहट सी ,,कैसी बेचैनी सी हर समय ,,,,,मेरी धड़कन की गति पता है तुम्हें , कितनी बढ़ी रहती थी ...कहीं हमसे दूर न हो जाओ , कहीं हमारी आँखों से ओझल न हो जाओ .....और तुम्हें न जाने क्या हो गया, न जाने ? .......तुमने हमारे मिलन को भी कैसे विरह में बदल दिया ......तुमने हमारी खुशी को दुख में तब्दील कर दिया .....उस महिला ने न जाने क्या कह दिया ,,न जाने क्यों मेरी गलती के बिना भी तुमने मुझे सजा दी ,,,मेरे प्रिय तुम्हें पता है न मेरे प्रेम की तुम जितनी परीक्षा लोगे यह उतन...