Posts

Showing posts from December, 2019
नया साल मुबारक हो मुबारक हो नया साल मन में खुशहाली हो होठों पर लाली हो दिल में दुआएं हो फूलों की छाँव हो है यह सपना लगे जग अपना छोटी सी चाहत है न कोई कभी आहत हो नदिया सी बहती जाऊँ खुशियाँ पिरोती जाऊँ पर्वतो की चोटियाँ पर बादलों की रंगरलियाँ हो चाँद रोज आकर बतियाये बच्चों सी  मस्ती की जाये माँ के साथ  कुछ पल बैठजाऊँ पंख लगाकर दुनिया घूम आऊँ इंद्र्धनुष देख झूम झूम जाऊँ फूलों को देख खूब मुस्कुराऊँ तितलियों के रंग कितने प्यारे प्यारे मन में भर जाये सारे हवा के संग दौड़ लगाकर दूर गगन में चमकते सूर्य को मुट्ठी में भर लाऊं भरी रहे आँखों में नमी और  जीवन को जी भर जी जाऊँ मुबारक हो नए साल में खुशियाँ तुम्हें और हमें भी ,,,, सीमा असीम 1,12,20
तुम हो तो सिर्फ मेरे  कितने सारे अनुभव  कितनी सारी स्मृतियाँ मन में उमड़ती घुमड़ती रहती हैं  मैं तुम्हें याद नहीं करती  पर रहते हो  हर वक्त यादों में  मैं सुनती नहीं अपनी धड़कनें  फिर भी कहती रहती हैं तुम्हें ही  डर जाती हूँ अक्सर  इतनी हिम्मत होते हुए भी  बिखर जाती हूँ मैं  भटकती नहीं हूँ कभी  रोते रोते धुंधला जाता है सब कुछ  और हो जाती हूँ इतनी पाक साफ  कि लगता ही नहीं कि मेरा शरीर भी बचा है  सिर्फ आत्मा रह गयी है  जो प्रेम से सराबोर है  रंग में रंगी हुई है  किसी आनंद के सागर में गोते लगा रही है  सारे दुख सारे कष्ट  कहीं खो गए हैं  सिर्फ बचा है तो सुख  खुशी और मुस्कान  हाँ प्रिय यही तो सच है मेरा  और रहेगा हमेशा  जन्म जन्मांतर तक  सीमा असीम  30 12 19 
कोई चाह नहीं है लेकिन बेइंतिहाँ  चाहत है मन में  सिर्फ तुम्हारे लिए और सिर्फ तुम ही हो क्या कहना है और क्या कहना चाहती हूँ शायद तुम समझ जाते हो बस इसीलिए ही मैं तुमसे कुछ भी कहना नहीं चाहती ,,पर सच कहुंतों सच सिर्फ यह है कि मेरी आँसू बहने शुरू हो जाते हैं और मेरा जिस्म बेजान हो जाता है ,,ना जाने कहाँ चली जाती है मेरे शरीर की जान , सनम क्या कहूँ मैं ,,क्या तुम सच में समझ जाते हो न ,, पता है न तुमको कि जबसे मांगा है सिर्फ तुम्हें ही मांगा है और कोई मांग नहीं है मन में ,,,जबसे चाहा है सिर्फ तुम्हें ही चाहा है ,, बस एक ही ख़्वाहिश है और कोई ख़्वाहिश नहीं है मेरी ॥ इतने शब्द मेरे मन में समा गए हैं लेकिन मैं निशब्द हो गयी हूँ कुछ कहने को जुबां खामोश हो गयी है और आँखों में इतनी मनी भर गयी है कि बस जरा सा दिल भरा और अश्क छलक जाते हैं बस मैं नहीं जानती ऐसा क्यों है पर यही सच है सिर्फ यही सच है कि तुम सिर्फ मेरे हो सिर्फ मेरे ,,,,, तुम्हें किस भाषा में कहूँ कि हर भाषा मौन हुई है तुम मौन को मेरी कोई भाषा दे दो कोई जुबां दे दो ,,, सीमा असीम 29 , 12, 19
|| ख़ुदा से सवाल || मेरे ख़ुदा ! यह क्या वशीभूत कर लेता है हमें प्यार में ? क्या घटता है हमारे भीतर बहुत गहरे ? और टूट जाती है भीतर कौन सी चीज भला ? कैसे वापस पहुँच जाते हैं हम बचपन में जब करते होते हैं प्यार ? एक बूँद केवल कैसे बन जाती है समंदर और लम्बे हो जाते हैं पेड़ ताड़ के और मीठा हो जाता है समंदर का पानी आखिर कैसे सूरज हो जाता है कीमती कंगन एक हीरे का जब प्यार करते हैं हम ? मेरे ख़ुदा : जब प्यार होता है अचानक कौन सी चीज छोड़ देते हैं हम ? पैदा होता है क्या हमारे भीतर ? कमसिन बच्चों से क्यों हो जाते हैं हम भोले और मासूम ? और ऐसा क्यों होता है कि जब हंसता है हमारा महबूब दुनिया बरसाती है यास्मीन हम पर क्यों होता है ऐसा कि जब रोती है वह सर रखके हमारे घुटनों पर उदास चिड़िया सी हो उठती है दुनिया सारी ? मेरे ख़ुदा : क्या कहा जाता है इस प्यार को जिसने सदियों से मारा है लोगों को, जीता है किलों को ताकतवर को किया है विवश और पिघलाया किया है निरीह और भोले को ? कैसे जुल्फें अपनी महबूबा की बिस्तर बन जाती हैं सोने का और होंठ उसके मदिरा और अंगूर ? कैसे हम चलते हैं आग में और मजे ...
गर जले जब मन में कभी आग  तो न रहे मन में जरा सी भी ईर्ष्य, द्वेष, और स्वार्थ   हो जाए सब भस्म जल कर उसी आग में ,,,,, हाँ यही तो होता है न ,,,जब मेरा मन जलने लगता है प्रेम की आग में तब उसकी लपटें इतनी तेज होती हैं कि जल जाता है सब कुछ और बचा रह जाता है सिर्फ प्रेम , क्योंकि प्रेम कोई वस्तु नहीं है न कोई आँसू या खुशी है बल्कि शाश्वत सत्य है जो सब कुछ जला कर खुद और भी ज्यादा निखर जाता है , ताप कर और पवित्र हो जाता है ... प्रेम एक ऐसी भावना है जिसे देखना चाहो तो जग रोशन कर दे और आँखें बंद करो तो मन रोशन कर देता है ,,,, सही बात तो यह है कि जब मन खुश होता है तब पूरी दुनिया बेहद प्यारी और खूबसूरत नजर आती है न , कहा भी तो गया है कि यह सारी दुनिया मन की है जैसा चाहो वैसा पालो ,,,इसीलिए मैं कहती हूँ कि तुम मेरे ही हो और मैं तुमसे ही हूँ ,यह जीवन उस दिन तक ही इतना प्यारा है जब तक हम हैं तुम हो और है हमारा प्रेम ..... क्या कहूँ या कैसे कहूँ शब्द कम हैं  और बहुत ज्यादा है हमारा प्रेम ,,,,,, सीमा असीम  26,12,19 
तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है अँधेरों में भी मिल गयी रोशनी है तुम हो तो क्या गम है, बस यही एक बात मेरे मन को तसल्ली देती है कि जब तुम मेरे साथ न होकर भी मेरे साथ हो तो फिर साथ होकर कितने ज्यादा करीब होते हो ... आज मन में सुबह से ही पुलक घर कर गयी थी मन खुशी से झूम रहा था कि जैसे किसी नयी खुशी ने मन में बसेरा कर लिया हो मेरा नाराज और उदास मन बिना किसी के मनाए जाने के बाद भी मान गया था , फिर मन मन  मरजी का गीत, नाचना और सर्द कोहरे भरे दिन में सूरज का चमकना ,, सब कुछ कितना सरल और सुखद था , न कोई उदासी , न रोना , मानों सेंटा खुशियों का खजाना लेकर आया है सारे दुख दूर करके खुशी और सुख का संदेश ले आया है , मेरा पवित्र निर्मल मन कुछ और ज्यादा साफ और खुश हो गया है ,,, सच में सच के जीत है और झूठ के आगे हार आखिर कब तक हम सच झूठ जीत हार का जश्न मानते रहेंगे , नहीं जानती लेकिन एक बात पक्की है कि सच कभी टूटता नहीं हारता भी नहीं हाँ कुछ समय को विचलित हो जाता है, बिखर जाता है  फिर उसका वही विचलन, बिखराव उसमें और भी ज्यादा चमक भर देते हैं , हैं न प्रिय तुम कहो न , कुछ बोलो कि सच हमेशा सच ...
मैंने तो साथ मांग लिया है तुम्हारा अब कभी कहीं मैं अकेली नहीं होती हाँ मैं यही तो कहना चाहती हूँ मैं कि तुम हमेशा मेरे साथ होते हो जहां मैं वहाँ तुम और जहां तुम वहाँ मैं कभी कहीं भी तुम्हें याद करने या पुकारने की जरूरत ही नहीं होती ! याद है न तुम्हें तुम ही तो कहते हो न कि साथ होने से हम साथ हो यह जरूरी नहीं है बल्कि हम तो हमेशा साथ है दूर रहकर भी , हैं न , सुनो अब की  बार जब तुम आना न तो कोई ऐसी निशानी दे जाना जिसे मैं हमेशा अपने पास रख सकूँ और जब जी चाहें उसे सहेजूँ , जब जी चाहें उसे निहार लूँ कि कहाँ जरूरत होगी फिर तुम्हारे होने की ,,, हैं न ,,, लेकिन क्या तुम नहीं चाहते कि हम साथ हो ,, हाथों में हाथ हों ,, दिन हो या रात हो सिर्फ प्यार की बात हो कि यह प्रेम ही बचा सकता है दुनिया को और जब है तो और कुछ माने नहीं रखता॥ प्रेम के आगे सब हार जाओ फिर भी कम है ,,प्रेम में कुछ बचता ही कब है ,,, कुछ भी नहीं सब मिट जाता है जलकर भस्म हो जाता है ,,, अहम ,,झूठ ,, दगा ,, छल ,,सब कुछ खत्म ,,बस बचा रहता है प्रेम और यही प्रेम हार कर भी नहीं हारता ,हर दफा जीत जाता है ,,कि पवित्र मन और सच के आग...
कैसे कह दूँ आकाश में कोहरा घना है हाँ मैं कैसे कह दूँ तुमसे तुम्हारी ही कमियाँ लेकिन है तो हैं जो सच है उसे झूठ कैसे कहा जा सकता है और जो झूठ है वो सच कैसे हो सकता है , जो है उसे स्वीकार कर लेना ही सही है कहाँ तक रोया जाये या खुद को सजा दी जाये ।खुद को चोट पहुंचा कर , खुद को ही तकलीफ देकर तुम्हारी गलती को मैं भुगतती राहून कितना कष्ट दूँ मैं खुद को , किस गुनाह की सजा दूँ मैं या देती रहूँ , मैं बस इतना जानती हूँ हर चीज का हर बात का एक वक्त होता है अगर वक्त गया है तो आ भी जाएगा फिर से आएगा और पहले से कहीं बेहतर आयेगा , मैं तो इस बात की हैरत मानती हूँ कि तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ,हो सकता है यही तुम्हारा धंधा हा हो ॥ खैर जाने दो बना लो मेरे खराब वक्त की मजाक , मुझे लगता है यही मेरा सबसे अच्छा वक्त ले आएगा , हँसता मुसकुराता और गीत गाता हुआ झूम कर नाचता हुआ जब हम साथ होंगे आपस में बात करते हुए क्योंकि मुझे पता है सच हमेशा सच रहता है न उसकी जीत होती है और न उसकी हार होती है ..... सुख की नदी फिर से लहलहायेगी देखना मेरे लबों पर मुस्कान थिरक जाएगी हाँ तुम हो सिर्फ मेरे ही सिर्फ मेरे ,,,,,...
कि आँख का पानी मर गया  उसकी आंख में नमी तक बची नहीं ,,,, ना जाने क्यों आँखें शर्म से झुक जाती हैं ! मैं अक्सर खुद पर ही शर्मिंदा हो जाती हूँ ! कैसे कैसे लोग होते हैं दुनिया में, जिनको न शर्म, न लिहाज, बस अपनी खुशी में खुश और दूसरे की खुशी में आँसू बहाने वाले ! सच में हद है नीचता की ,, क्या तुम जानते हो कि तुमसे कुछ भी कहने का मतलब है खुद के लिए ही कुछ कहना ! तुम्हें गलत कहना मतलब खुद को  गलत कहना, तुम्हें नीचे गिराना मतलब खुद को नीचे गिराना ,हाँ मैं तुमसे नाराज हूँ बहुत ज्यादा नाराज बल्कि यह कहना चाहिए कि मैं खुद से नाराज हूँ ,मैं नहीं चाहती कि तुम मुझे मनाओ इसीलिए मैं खुद से नाराज हूँ तुमसे नहीं, बस शर्मिंदा हूँ सोच सोच कर तुम्हारे प्रेम पर नहीं बल्कि अपने ही प्रेम पर, तुम कैसे कर लेते हो यह सब।  कैसे ? झूठ भी इंसान को उतना ही बोलना चाहिए कि सध जाये, इतना झूठ और बात बात पर झूठ ,, एक झूठ के चक्कर में तुम खुद ही सोचो कि तुमने कितने झूठ बोले हैं और लगातार बोलते ही जाओगे इसलिए तुमसे क्यों कुछ कहूँ, बस बहने दो मेरे आँसू , मत करना कभी इनकी फिक्र , न कभी सोचना मेरे बारे म...
कि जब तुम्हें मैं याद करती हूँ कि मैं तुम्हें कब याद नहीं करती ... जब कभी पल भर को भी तुम्हें भूलना चाहता है मेरा मन कि उसी पल फिर से तुम्हें याद करना चाहता है मेरा मन ,,,खूबसूरत पलों को पलकों में बंद करके जब मैं देर तक सोचती हूँ तो मन कभी व्याकुल हो उठता है और कभी खुशी से झूम उठता है आखिर मन ही तो है और मन के बारे में कैसे जाना जा सकता है और जिसने मन की महिमा को जान लिया वो जीत गया खुद से भी और अपने मन से भी की जीतने के लिए और क्या चाहिए कुछ भी तो नहीं सिवाय आत्मविश्वास के या मन के विश्वास के ...... भ्रम में जीना जिंदगी तो है पर एक सपना है और सपना कभी अपना नहीं होता वो सिर्फ राह दिखा सकता है लेकिन अपना हमेशा अपना ही रहता है किसी भी मुश्किल में साथ खड़ा होता है उसे किसी तरह से अपना नहीं बनाना पड़ता है क्योंकि अपनों के हमारे मन से तार जुड़े होते हैं वे न तो कभी उलझते हैं और न कभी सुलझाने पड़ते हैं वे तो हमेशा मन के महीन तर से जुड़े होते हैं आखिर वे हमारे अपने होते हैं जिनको हमारी परवाह होती है हमारे सुख और दुख की हमारी खुशी और सुख में वे भले ही न साथ हो लेकिन हमारे दुख में सदा किसी मजबू...
विरह की घड़ियाँ हुई अलि मधुर मधु की यामिनी सी ! दूर के नक्षत्र लगते पुतलियों से पास प्रियतर , शून्य नभ की मूकता में गूँजता आह्वान का स्वर , आज है निःसीमता लघु प्राण की अनुगामिनी सी ! एक स्पंदन कह रहा है अकथ युग युग की कहानी ; हो गया स्मित से मधुर इन लोचनों का क्षार पानी ; मूक प्रतिनिश्वास है नव स्वप्न की अनुरागिनी सी ! सजनि ! अंतर्हित हुआ है ‘ आज में धुँधला विफल ‘ कल ’ हो गया है मिलन एकाकार मेरे विरह में मिल ; राह मेरी देखतीं स्मृति अब निराश पुजारिनी सी ! फैलते हैं सांध्य नभ में भाव ही मेरे रँगीले ; तिमिर की दीपावली हैं रोम मेरे पुलक - गीले ; बंदिनी बनकर हुई मैं बंधनों की स्वामिनी सी बंधनों में खुशियाँ .....
सच कहूँ तो आज कुछ लिखने का दिल ही नहीं चाह रहा ,कुछ भी कहने का, सुनने का, सुनने का कोई भी फायदा कहाँ होता है या कभी होगा भी इसलिए बस चुप रहो एकदम से चुप बल्कि इतना खामोश हो जाओ कि खामोशियाँ  बोलने लग जाये शोर मचा दे इतना कोलाहल मच जाए कि कुछ भी कहने सुनने की जरूरत ही न रहे लेकिन ना जाने कब बोल पड़ेगी यह खामोशी तब पीटीए नहीं जाने क्या होगा , कहीं कुछ गलत न हों जाये ,, दिल न जाने क्यों चाहता है उस शख्स को सजा देना जो गलत है और अपनी गलती अपने झूठ पर शर्मिंदा नहीं है बल्कि वो बेशर्म की तरह से डटा हुआ है मानों वो सही है सच है और उसने कोई गलती नहीं की है ! ऐसे लोगों को क्या कहा जाये ? क्या सुना जाये ? किस तरह से उसे अपनी गलती का अहसास कराया जाये ? कोई कैसे इतना गिर जाता है ? कैसे अपने आप को समझा पाता है और किस तरह से अपनी गलती का उसे अहसास होगा ? न जाने कब वो कहेगा कि मैंने गलत किया ? मैंने तुम्हें दुख दिया ! मैंने ही भरे तेरी आँखों में आँसू ,लेकिन वो कहाँ समझ पाएगा मेरा दर्द और मेरा दुख जबकि वो खुद की खुशी में डूबा है और खुद को हर तरह से सही मानता है और किसी भी तरह से शर्मिंदा नहीं है ...
राग बहार बजता है मेरे भीतर अनवरत सुख, दुःख, धूप छाँव रोने हँसने औ हर मौसम में तेज़ हवायें जब मेरे मन को झकझोरती हैं तब खामोशियों के बीच ऋतुये चहचहाने लगती हैं गौरैया सी और समस्त पृथ्वी मानों परिक्रमा करने लगती है मेरे चारो ओर क्योंकि जी रही हूँ स्वार्थ से परे सिर्फ़ सच को ! सीमा असीम  18,12 19 
Image
कितना कुछ कहना है मुझे तुमसे लेकिन मैं कहाँ कुछ कह पाती हूँ ये खामोशीयों मेरा मन मार देती है और आँखों में भर जाते हैं अश्क कैसे कह पाऊँगी अपने मन की सारी बाते , कैसे सुना पाऊँगी वे सब बातें जो मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कितनी मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजरती हूँ मैं किस तरह से खुद को कंट्रोल करती हूँ कैसे पता चलेगा तुम्हें कौन बताएगा और कैसे तुम जान पाओगे जो मैं कहना चाहती हूँ बार बार कहना और बताना चाहती हूँ कि कैसे तुमने वो सब किया होगा या कैसे तुम्हारी अंतरात्मा ने स्वीकार किया होगा किसी अन्य को हाथ से छु भी पाना ,,, शायद यही नियति थी तुम्हारी गलती कैसे मान लूँ प्रिय कैसे मैं तुम्हें दोषी बना दूँ जबकि तुमने मुझे आज तक सच बताया तक नहीं बार बार पुछने पर भी और जब तुमने बताया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि तुम ऐसे हो सकते हो या ऐसा कर भी सकते हो , क्योंकि मैं तो तुमको एक सच्चा और अच्छा इंसान मानती हूँ ,,मुझे लगता है कि तुम खुदा आकर  भी कहे तब भी मैं इस बात को सच नहीं मानूँगी , हाँ नहीं मानूँगी इस बात को , कहने दो कोई कुछ भी कहता है , तुम सिर्फ मेरे हो सिर्फ मेरे मेरे अलावा तुम किसी ...
Image
सीमा असीम की कहानियों की दूसरी किताब ,,,
Image
सीमा असीम की पहली काहनियों की किताब ,,,
Image
सीमा   सक्सेना   असीम   का   उपन्यास  " अडिग   प्रेम "  पढ़ना   एक   स्त्री   के   मन   की   यात्रा   करने   जैसा   है। एक   किशोरवय   लड़की   जो   अपने   अध्यापक   के   प्रति   आसक्त   होती   है   और   परिस्थिति   वश   उसके   साथ   एकाकार   भी   होती   है   और   संपूर्णता   के   साथ   समर्पित   भी। सच्चे   और   अडिग   प्रेम   का   प्रतीक   तथा   तन   से   परे   होकर   भी   मन   तक   पहुंचा   जा   सकता   है   इसका   दस्तावेज   है   यह   उपन्यास  " अडिग   प्रेम "  amazon पर उपलब्ध है ,,,  
Image
मेरी पहली पुस्तक ,,,,, amazon पर उपलब्ध है 
https://images-na.ssl-images-amazon.com/images/I/51sYtPgAK5L._SY366_BO1,204,203,200_.jpg सीमा सक्सेना असीम का उपन्यास " अडिग प्रेम " पढ़ना एक स्त्री के मन की यात्रा करने जैसा है। एक किशोरवय लड़की जो अपने अध्यापक के प्रति आसक्त होती है और परिस्थिति वश उसके साथ एकाकार भी होती है और संपूर्णता के साथ समर्पित भी। सच्चे और अडिग प्रेम का प्रतीक तथा तन से परे होकर भी मन तक पहुंचा जा सकता है इसका दस्तावेज है यह उपन्यास " अडिग प्रेम " https://www.google.com/url?sa=i&source=images&cd=&ved=2ahUKEwjtyP-hkL3mAhWSA3IKHZl7BbUQjRx6BAgBEAQ&url=http%3A%2F%2Fwww.hastakshep.com%2Fold%2Ftag%2Fseema-aseem-saxena%2F&psig=AOvVaw39YApd3hv3fpT1peNk3NU0&ust=1576687350127161
जब मैं लिखती हूँ दर्द तब छलकती हैं दर्द की आँखें भी ... यही तो सच है न और सच को बदला नहीं जा सकता है सच हमेशा सच ही रहता है ,,,,न जाने मैं तुम्हें कैसे बता पाऊँगी या जाने तुम कैसे समझ पाओगे या फिर कभी तुम्हें अहसास भी होगा या नहीं पता नहीं मैं कुछ नहीं जानती लेकिन इतना जानती हूँ कि मैंने सच्चे मन से चाहा और चाहती रहूँगी कभी भी अपने किए वादों से पीछे नहीं रहूँगी ! बस यही एक बात ही मेरे टूटते हुए मनोबल का सहारा है कि जो कहा है उसे हर हाल में पूरी श्रीद्धा से निभा कर रहूँगी भले ही इसके लिए मुझे अपनी जान ही क्यों न देनी पद जाये आखिर इंसान कि जुबान ही उसे उठाती और गिराती है अगर हम अपनी जुबान के धनी हैं तो दुनिया की कोई भी शक्ति हमें नीचा नहीं दिखा सकती क्योंकि हम जो हैं सो हैं और वही बने रहेंगे ! यही मेरा अडिग विश्वास है और मेरे जीवन की शक्ति भी ! जब कभी मैं लिखना चाहती हूँ कि मुझे अपने हर पल में शक्ति चाहिए जीने की ऊर्जा चाहिए तो मुझे मिल जाती है और मैं हर मुश्किल हर कठिनाई से बाहर निकल आती हूँ , रोते हुए भी मुस्कुरा देती हूँ और मरते हुए भी जी उठती हूँ ! सब कुछ वैसा ही है सब वैसा ही र...
उदासियाँ कभी अकेली नहीं होती कि साथ हो तुम मेरे उदासी में ,,, कहने के लिए कोई शब्दों की जरूरत नहीं होती है जब बातें करता  रहता है मेरा मन हरदम तुमसे बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले सब कह आता है सब सुन आता है सब समझ आता है मुझे बिना कहे सुने भी शायद तुम नहीं समझ पाते होगे , शायद तुम्हें पता नहीं चल पता होगा या शायद नहीं सुन पाते होगे मेरी आवाज ,,हाँ कुछ भी हो सकता है न , कहाँ हमारे वश में होती है हमारी परिस्थितियाँ ,हैं न , हम वक्त के गुलाम होते है न , लेकिन यह सब गलत बातें हम जो कुछ भी करते हैं या जो हमारे साथ हो रहा होता है उसमें परिस्थिति से ज्यादा हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं हम अपने साथ जो कुछ भी करते हैं सोच समझ लेते हैं तब ही करते हैं लेकिन प्रेम हम सोच समझ कर नहीं करते हैं , प्रेम तो हो जाता है और जब प्रेम हो जाता है तो हमें अपना प्रेमी ईश्वर के रूप में नजर आने लगता है और उसे ईश्वर की तरह मान सम्मान देने लगते हैं , इन सब बातों से बेखबर होकर कि जिसे हम चाहते हैं और जिसके प्रति समर्पित हैं वो सिर्फ हमारी भावनाओं का फायदा उठाने के लिए हमें और हमारे प्रेम को छल तो नहीं रहा , हमें म...
मेरा ही मन कहीं मुझसे बगावत न कर ले कि मैंने खुद को इतना खामोश कर लिया हाँ सच में कुछ भी कहना नहीं चाहता है मेरा मन क्योंकि तुमने मेरी आत्मा को इतना कष्ट पहुंचाया है ,इतना दुख दिया है मेरी आत्मा को कि अब वो मुसकुराना भूल गयी है उसे अब याद नहीं आ रहा कि कैसे मुस्कुराए किस तरह तुम्हें माफ करे ,,तुम ऐसे आखिर हुए कैसे मैं तुमसे कभी कुछ कहना नहीं चाहती हाँ मैं तुम्हें तुम्हारी नजरों में गिराना नहीं चाहती नहीं चाहती वो सब बातें तुमसे कहना जिनसे तुम्हें दुख हो ,,क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि जो कुछ तुम करते हो उससे तुमने मुझे कितना दुख दिया है कितनी तकलीफ़ें दी हैं क्या तुम्हारी आत्मा मर चुकी है जैसे तुम्हारा जमीर मारा है उसी तरह से ,,सच में बहुत दुख होता है मुझे कि मैंने तुम जैसे शख्स पर अपना सब कुछ लूटा दिया और तुम्हारी आँखों में जरा सा पानी तक नहीं , इस तरह से भी कोई करता है क्या , क्या कोई ऐसा भी इंसान होता है , कैसे तुम खुद को ही आईने में देख पाते होगे ,कैसे खुद को सही पाते होगे , शायद तुम्हें खुद पर ही घिन आ जाती होगी , शायद तुम्हारा मन अपने लिए ही घृणा से भर जाता होग...
तुझे पुकारूँ मैं और तेरा नाम ना लूँ यह कैसे हो सकता है कि आओ या ना आओ यह सिर्फ तेरा ही काम है ॥  हाँ मैं तुम्हें पुकारती हूँ दिन रात पुकारती हूँ और कभी धीरे कभी ज़ोर से नाम लेकर पुकारती हूँ और फिर अपने गले से लागकर हँसती गाती रोती हूँ लेकिन नहीं कह पाती हूँ कभी अपने मन की बातें अपने सुख अपने दुख अपने दर्द , मैं कहाँ कह पाती हूँ कभी कुछ भी, कभी नहीं कहा आज तक कि तुमने मुझे किस गलती की सजा दी किस बात के लिए इतने दुख दिये किस कमी के लिए कुछ और भटके नहीं पता मुझे कुछ भी बस इतना पता है कि मैं सिर्फ तुम्हारे अलावा कुछ और कभी सोच ही नहीं पाई ॥कहीं भी रहूँ या कुछ भी करूँ सिर्फ तुम ही ख्यालों या बातों में रहते हो क्या तुम्हें इस बात का अहसास नहीं होता अगर नहीं होता तो कोई बात नहीं शायद तुम इतने खुशकिस्मत नहीं हो कि तुम इन अहसासों को जी पाओ या महसूस कर पाओ क्योंकि यह देवीय अहसास हर किसी को नसीब नहीं होते हैं हर कोई इन्हें नहीं पा सकता <<<बिना किसी स्वार्थ के किसी को चाहना क्या इतना आसान है खुद को मिटा देना खत्म कर देना क्या इतना आसान है नहीं न ,,,हाँ मुझे पता है मैंने जान बुझ कर ...
Image
कितनी चाहत है और कितना दर्द है दिल में कैसे कहा जाएगा कैसे तुम्हें बताए सनम हाँ यही सच है न प्रिय कि तुमसे कुछ भी कहना कितना मुश्किल काम है कुछ भी कहा नहीं जाता और तुम मेरी खामोशी कभी समझते नहीं या समझ कर समझना नहीं चाहते ,,प्रिय तुम भी मुझ से होते तो समझते कि प्रेम आखिर होता क्या है , कैसे किया जाता है और कैसे निभाया जाता है ऐसे नहीं होता कि कभी कोई या कभी कोई जो भी साथ चल पड़ा वही तेरा हो गया ,,प्रिय बहुत दर्द होता है प्रेम में जिस्म से जान निकल जाती है और अशक आँखों में स्थायी रूप से घर बना लेते है पल पल में छलक़ते हैं कभी नहीं रुकते बहते हुए आँसू या बात बात में आँखों से गिर पड़ते हैं न जाने कब तक यह दर्द मेरी आँखों से बहेगा ? न जाने कब तक यह दर्द मुझे दुख देता रहेगा ,,,हे ईश्वर जिसे मैं पसंद करूँ वो किसी और को कैसे पसंद कर सकता है ? कैसे किसी और के लिए दिल धड़का सकता है जबकि उसकी धड़कने तो मेरी  धड़कनों के साथ धड़कती हैं ,,,कभी कभी समझ नहीं आता है कुछ ,,कुछ भी समझ नहीं आता ,,,कोई इंसान का जमीर नहीं होता ,,क्या उसका कोई भगवान नहीं होता ? ओ रब तेरे लिए ही मेरी हर सांस है कि बस गया है ...