तू जो बताता फिरता है
गैरों को उनकी औकात
अब तेरी औकात
सबको समझ आने लगी है
तू क्या है जान गये हैं सब
गिर चुका है शायद तू
खुद की ही नजरों में
इसलिए ही सबसे
मुँह छुपाये बैठा है
लूटता है जी भर के
लोगों को तू
करके बर्बाद
अपने खोल में घुस जाता है
औ बेगैरत इंसान
कितना उड़ाया तूने
फ्री का माल समझ कर
क्या तुझे पता भी है
कि तेरे कर्मो का
फल तुझे मिलेगा जरूर
फिर कहाँ मागेगा पनाह
किस के दर पर अपना
सिर पटकेगा
तुझे कोई कहीं भी सकूं नहीं आयेगा
जब तेरा दिल बेचैन होकर
तड़पेगा
इस तङप में तङप तङप मर जायेगा
बिना जमीर का इंसान
तू मुझे क्या सता रहा
देखना एक दिन
ईश्वर तेरा क्या हश्र बनायेगा
मेरे दिल को न जाने
क्या हुआ है
जो इन बातों को
महसूस करता है
लिखता है
शायद यहीं सच हो जाये...
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