रिक्शे वाला , लघुकथा

 सर्दी का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ गया था, बहुत अधिक कोहरा पर गिर रहा था जिसकी वजह से उसकी 2 दिन से कोई कमाई नहीं हो रही थी वह रिक्शा लेकर जाता और वापस लौट के घर आ जाता था कोई सवारी मिलते ही नहीं थी जो भी सवारी होते थे या तो वह पैदल चली जाती होती थी या कोई अपने वाहन से रिक्शे पर बैठने वाली कोई सवारी मिली ही नहीं उसे, आज भी सुबह-सुबह वो  भगवान का नाम लेकर अपना बैटरी वाला रिक्शा लेकर घर से निकल गया था आज अगर कुछ भी  पैसा नहीं मिला तो कैसे करेगा काम  धंधा चलेगा,  घर का खाना पीना भी ।  अब तो घर में राशन भी खत्म होने लगा है छोटे बच्चे का दूध भी तो रोज ही लाना पड़ता है। हे  भगवान आज एक सवारी मिला देना, रास्ते में चाय के ठेले पर लोग चाय पी रहे थे अंगीठी पर हाथ  सेकते जा रहे थे । वहीं पर एक छोटी सी बच्ची चाय पी  रही थी । उसने बड़े ध्यान से देखा,  उसके पास एक बंद थी और एक बिस्किट का पैकेट भी था और एक कुल्हड़ में गरम गरम चाय । जरूर किसी ने तरस खाकर उसको दे दी होगी चाय बिस्किट आदि  ।  मां बाप बच्चों को पैदा करके यूं छोड़ देते हैं और बच्चे ऐसे ही मांग मांग कर खाते पीते  हैं । क्या जीवन है इसका?  क्या भविष्य है? वह कुछ भी करता है अपने बच्चों को तो पाल ही  रहा है । नहीं पढ़ा लिखा है तो रिक्शा चलाकर ही सही ।  कल को यह  जवान हो जाएगी, लोगों की नजरें इस पर गड़ी रहेंगी, हे ईश्वर इस बच्चे की रक्षा करना।  उसने मन ही मन प्रार्थना की । वीएच अभी  प्रार्थना कर ही रहा था । तभी उसे आवाज आई ।

" भैया सुनो" उसने जल्दी से रिक्शा रोक दिया कहीं कोई दूसरा रिक्शावाला न आ जाये । 

 क्या आकाशवाणी चलोगे ?

हाँ  बैठिये ना मैडम,। 

वो  बहुत खुश था चलो एक सवारी तो मिली । बोनी तो हुई  अब आगे भी मिलेंगी  । और खूब  तेज चलाता हुआ  सीधे आकाशवाणी पर जाकर रोका, मैडम ने उसको सौ का नोट देते हुए कहा॰ लो भैया 

उसने कहा मैडम ₹50 हुए लेकिन मैडम ने उसे ₹100 देते हुए कहा,  भैया आज तुम सुबह सुबह इतनी ठंड में  ले कर आए हो ।  कोई बात नहीं रख लो सर्दी के दिन है 

मैडम ऐसा कहती हुई चली गई । उनके चेहरे पर एक बहुत प्यारी सी स्माइल थिरक  रहीं थी और रिक्शे वाले के मन से उनके लिए दुआ निकल रही थी । 

सीमा असीम 

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