प्रेम
सुनो अब मुझे तुमसे प्रेम करने के लिए
तुम्हारे होने की जरूरत नहीं है
क्योंकि मैंने प्रेम किया है
कोई व्यापार तो नहीं किया
कि मैं तुम्हें प्रेम करूं और
तुम भी बदले में मुझे प्रेम दो
काश तुमने भी किया होता प्रेम
तो तुम ऐसा सोचते
तुम मेरी परवाह करते
मेरा ख्याल रखते
मेरे रोने पर रोते
मेरे हंसने पर हंस देते
पर सुनो तुमने तो प्यार नहीं
एक खेल किया था
खूब खेला और
जब जी भर गया तो छोड़ दिया
बिना इस बात की परवाह किए
कि जो तुम्हें प्रेम करती है
जो तुम्हारे प्रेम में है
क्या होगा उसका
वह कैसे जियेगी
कि वह कैसे सांस लेगी
वह कैसे रहेगी
उसकी आंखों के आंसू कभी सूखेंगे
क्या उसके चेहरे पर कभी मुस्कान आएगी
कभी वह फूलों को देख कर खिल खिलाकर हंस पाएगी
कभी वह सूरज को देखते हुए नमन करेगी या
कभी चंद्रमा की तरफ नजर उठाकर देखेगी और
उसके दिल में शीतलता आयेगी...
सीमा असीम
शायद नहीं है ना
अगर सोचा होता
तो तुम यूं ना करते
कभी ना करते
ऐसे ना करते
निभाते तुम हर हाल में निभाते....
सीमा असीम
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