मैंने अपनी बाहें हवा में फैला रखी है
मानों तुम आओगे और समां जाओगे 
सुनो प्रिय
 कितना पुकारता है तुम्हें मेरा मन और तुम्हें पुकारते पुकारते हुए खुद से ही रूठ जाता है आखिर  कितना पुकारूँ मैं तुम्हें,  क्या तुम समझ जाते हो या तुम्हें समझ नहीं आता है वैसे मुझे तो लगता है कि तुम मेरे मन की हर बात बिना कहे समझ जाते हो, जैसे मैं समझ जाती हूँ मुझे नहीं लगता है कि हमें अपनी बातें एक दूसरे से कहनी चाहिए लेकिन जब कभी मन बहुत ज्यादा भारी होता है तब दिल चाहता है कि मैं अपने मन की हर वो बात तुमसे कह दूँ जो मुझे दुःख दे रही है गलत भावनाएं मन में भर रही है और मेरा जीना ही मुश्किल किये दे रही है ,पता है यूँ लगता है मुझे कि यह जीवन यह ज़िंदगी व्यर्थ है इसका कोई मतलब ही नहीं है न जाने क्यों जिए जा रही हूँ न जाने कौन सी आस जीने को मजबूर कर रही है १
सनम एक कहानी बता रही हूँ तुम्हें कहानी क्या हकीकत ही है एक दिन जब मैं सुबह मॉर्निग वाक पर जा रही थी तब  मैंने देखा एक चिड़िया फुदकती हुई जमीं पर उतरी मैनें उसे बड़े प्यार से देखा और उसे बाहों में भरना चाहा तभी उसने अपने पंख फैलाये और आकाश कि तरफ उड़ गयी ! मैं सोचने लगी कि यह पंछी और इनका जीवन इनका अपना होता है न किसी का बंधन न किसी का प्रेम इन्हें आकृष्ट नहीं करता अपने मन के मौजी!  बस यही तो जीवन है और ऐसा ही होना चाहिए लेकिन हम इंसान क्यों बंधन में जीना पसंद करते है और क्यों किसी को बाँध लेना चाहते हैं क्यों उसकी आजादी छीन कर अपनी गिरफ्त में लेकर प्रेम की बेड़ी से जकड कर उसे दुःख देना चाहते हैं बस यही बात समझ नहीं क्या हम प्रेम में स्वार्थी और सिर्फ अपने लिए ही जीते है अपनी ख़ुशी में खुश और दूसरे की ख़ुशी में दुखी न जाने कब हमें दूसरों के दुःख में दुखी और और सुख में सुखी होना आएगा शायद तभी हम एक सच्चे इंसान बन पाएंगे और हमारा जीवन सफल होगा ,,,,
क्या चाहती हूँ और क्यों चाहती
मुझे खुद भी नहीं पता  है
बस मेरी आँख के आंसू
बहते बहुत हैं ,,,
सीमा असीम
३१,८,19 

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