जानती हूँ मुश्किल होता होगा तुम्हें यूँ मेरे बंधन में
गर तुम समझ सको तो समझो कि आजाद हो तुम
सुनो
      सिर्फ तुम ही तो हो  जिसे मैं दिलो जान से प्रेम करती हूँ और मैं बिलकुल भी नहीं चाहती कि तुम्हें कण मात्र भी  कष्ट हो क्योंकि तुम्हें जरा भी तकलीफ मेरी जान निकाल देती है और   मैं  नहीं चाहती मैं अल्पायु में मर जाऊं  मैं जीना चाहती हूँ जी भर कर जीना चाहती हूँ और तुम्हारे साथ जीवन के सारे सुख लेना चाहती हूँ तभी तो तुमसे दूर रहकर भी हमेशा तुम्हारे ख्यालों में रहती हूँ इस तरह से दूर रहकर करीब हो जाती हूँ लेकिन प्रिय मैं तुम्हारे इतना करीब रहना चाहती हूँ कि अगर तुम स्वांस भी लो तो मैं उसकी गर्मी को महसूस कर सकूँ ,तुम इतने करीब रहो न प्रिय कि मैं तुम्हारी एक एक धड़कन को सुन सकूँ , मुझे नहीं पता है कि ईश्वर हमारी इतनी परीक्षाएं क्यों लेता है ,क्यों इतने दुःख देता है क्यों नहीं हम सुख को जी  पाते हैं क्यों हम दुःख के भवर में अटक जाते हैं क्यों दिल भरा भरा रहता है और क्यों आंसूं थमते नहीं हैं औार जी चाहता है कि मेरे पंख आ जाएँ ताकि मैं उड़कर तुम्हारे पास आ जाऊं  बेहद करीब कि फिर हमें कोई जुड़ा न कर सके। ......
सनम आओ इतने करीब मेरे कि कोई दुरी न रहे
होकर रहो सिर्फ मेरे कि कोई मज़बूरी न रहे !!

सीमा असीम
१८,८,१९ 

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