नम आँखों की नमी कभी कम नहीं होती
इनमें ख्वाब ही इतने तैरते हैं
आज मैं बहुत उदास हूँ पूरा दिन मन पर उदासी के बादल मंडराते रहे, आँखों से आंसू बहते रहे लाख कोशिशों के बाद भी चेहरे पर नाममात्र की मुस्कान नहीं आयी, न जाने कहाँ से इतना दर्द दिल में समां गया है कि हंसने मुस्कुराने का मन ही नहीं करता है, क्या करूँ मैं ऐसी ही हूँ और कितना बदलूंगी मैं, बिलकुल ही बदल लिया खुद को , तुम्हारे सांचे में ढल गयी.
मेरे में मेरे जैसा कुछ नहीं बचा है बस मुझे इतना पता है कि मैं चाहें कैसी भी रहूं तुमको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला कभी भी नहीं बस तुम मुझे कहते रहो कि ऐसा मत करो वैसा मत करो न जाने कितनी बंदिशें लगा दी कभी सोचा है तुमने कि मोहब्बत और गुलामी में अंतर होता है लेकिन तुम कहाँ समझोगे और कैसे समझोगे जबकि तुमने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की और शायद कभी समझ कर करोगे भी क्या ?
है न?
वैसे मैं सच में एक बात नहीं समझ पा रही हूँ कि मेरे मन में मेरे दिल में तुम्हारे लिए इतनी शिकायतें क्यों आ गयी हैं ? क्यों मैं तुम्हें गलत समझने लगी हूँ ? क्यों मेरे दिल में तुम्हारे लिए उतनी इज़्ज़त नहीं रही, जितनी पहले थी।
क्यों और कैसे खो गया तुम्हारा सम्मान मेरी नजरों से क्यों बताओ न मुझे मैं जानना चाहती हूँ हाँ मुझे बताओ प्रिय मेरा प्यार और मेरा सम्मान पाने के बाद बनाये रखना तुम्हारे हाथ में ही था न , फिरर ,,,,
ओह्ह बहुत दर्द और तकलीफ होती है कि जीना मुश्किल हो रहा है अब तुम ही बताओ मैं कैसे इस तकलीफ से निजात पाऊं ,,,,
अश्क जब आँखों में भरे रहते हो
तब बहने ही लगते है सनम
सीमा असीम
२६,८,19
इनमें ख्वाब ही इतने तैरते हैं
आज मैं बहुत उदास हूँ पूरा दिन मन पर उदासी के बादल मंडराते रहे, आँखों से आंसू बहते रहे लाख कोशिशों के बाद भी चेहरे पर नाममात्र की मुस्कान नहीं आयी, न जाने कहाँ से इतना दर्द दिल में समां गया है कि हंसने मुस्कुराने का मन ही नहीं करता है, क्या करूँ मैं ऐसी ही हूँ और कितना बदलूंगी मैं, बिलकुल ही बदल लिया खुद को , तुम्हारे सांचे में ढल गयी.
मेरे में मेरे जैसा कुछ नहीं बचा है बस मुझे इतना पता है कि मैं चाहें कैसी भी रहूं तुमको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला कभी भी नहीं बस तुम मुझे कहते रहो कि ऐसा मत करो वैसा मत करो न जाने कितनी बंदिशें लगा दी कभी सोचा है तुमने कि मोहब्बत और गुलामी में अंतर होता है लेकिन तुम कहाँ समझोगे और कैसे समझोगे जबकि तुमने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की और शायद कभी समझ कर करोगे भी क्या ?
है न?
वैसे मैं सच में एक बात नहीं समझ पा रही हूँ कि मेरे मन में मेरे दिल में तुम्हारे लिए इतनी शिकायतें क्यों आ गयी हैं ? क्यों मैं तुम्हें गलत समझने लगी हूँ ? क्यों मेरे दिल में तुम्हारे लिए उतनी इज़्ज़त नहीं रही, जितनी पहले थी।
क्यों और कैसे खो गया तुम्हारा सम्मान मेरी नजरों से क्यों बताओ न मुझे मैं जानना चाहती हूँ हाँ मुझे बताओ प्रिय मेरा प्यार और मेरा सम्मान पाने के बाद बनाये रखना तुम्हारे हाथ में ही था न , फिरर ,,,,
ओह्ह बहुत दर्द और तकलीफ होती है कि जीना मुश्किल हो रहा है अब तुम ही बताओ मैं कैसे इस तकलीफ से निजात पाऊं ,,,,
अश्क जब आँखों में भरे रहते हो
तब बहने ही लगते है सनम
सीमा असीम
२६,८,19
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