शकों कभी चैन तो लेने  दिया करो सनम
मुस्कान कभी खुलकर मुस्कुरा नहीं पाती है
कभी कभी लगता है कि मैंने तो सच्चा प्रेम किया और तुमने चाहें जो भी किया नहीं जानना चाहती लेकिन मेरे जिस्म से कोई जान खींचे लिए जा रहा है ऐसा महसूस होता है सीधा कलेजे को चीरता हुआ कोई तीर पार हुआ जाता है सुनो न तुम मुझे यह बता दो कि तुम्हें किस बात कि कमी थी या कौन सा वो लालच था या कौन सी तलाश थी या क्या पाने की चाह थी जो तुम मुझे साथ रखकर भी किसी और को भी गले लगते रहे मान जाओ अभी भी वक्त है कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे पास कुछ भी न बचे प्रिय क्या तुम्हे पता नहीं चलता या तुम्हें अहसास नहीं होता है कि मुझे किस दर्द और तकलीफ से गुजरना पड़ता है मैं चीखती हूँ चिल्लाती हूँ दर्द से तड़पते हुए खुद को ही कष्ट देती हूँ कभी अपना हाथ काट लेती कभी अपने सर को दीवार से टकराती हूँ फिर भी चैन नहीं आता सकूँ नहीं आता सनम मैं मैं इस दुनिया में रहकर भी इस दुनिया की नहीं रही बेगानी हो गयी मैं हूँ सबसे ,कभी सोचा है तुमने अपने खुद के  बारे में प्रिय तुम इस दुनिया के सबसे प्यारे इंसान हो और भोले भी तुम नहीं जानते कि सब बहुत स्वार्थी हैं सब खुद का भला सोचते हैं सब अपनी ख़ुशी के लिए किसी को कितना  भी गिरा सकते हैं और उठा सकते हैं ..
तेरा ही ख्याल है तेरी ही यादें  हैं
तेरी ही ख़ुशी की मेरे मन में बाते हैं
सीमा असीम 
२८,८ 19

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