सोचती हूँ कि रात आये तो ख्वाब में आप आएं
सुबह हो तो आप सच में सामने आ जाए। ..
सुनो प्रिय हम कितनी उम्मीदें ख्वाहिशें पाल लेते हैं और उन उम्मीदों और ख्वाहिशों का पीछा करते हुए पूरी ज़िंदगी गुजार  देते हैं और वे हमें कितने दुःख तकलीफ    और कष्ट देते इसकी परवाह ही नहीं करते वैसे परवाह करें भी तो करे कैसे क्योंकि हम तो अपनी सुध बुध बिसराये उन उम्मीदों से ऐसे बांध जाते हैं कि हम उनसे पार नहीं पा पाते ,
क्या कहूं बस  यही कहना है कि मैं आजकल इसी डोर में बंध गयी हूँ और बंधन इतना मजबूत है कि कोई तोड़ नहीं सकता न हम न ही कोई और शायद ईश्वर भी नहीं !
सनम आज तो मेरा न मन अच्छा है और न ही तन किसी मशीन की तरह खींचे लिए जा रही हूँ और मेरा बेजान मन तुमसे  कई सवाल करना  चाहता है मिलकर कुछ पूछना चाहता है लेकिन क्या मैं तुमसे वो सवाल पूछ पाऊँगी अगर पूछ भी लिए तो क्या तुम मुझे सही जवाब दे पाओगे या फिर आज तक जिस तरह से बहलाते रहे उसी तरह से फिर बहला दोगे  तुम पर  तरह विश्वास कर लुंगी और उस विश्वास ऐतबार   पूंजी मान कर सहेजे रहूंगी सही में मैं  तुमपर बहुत ज्यादा विश्वास करती हूँ और वो विश्वास किसी भी आंधी या तूफ़ान से हिलता नहीं है  पर तुम्हारे जरा से ठेस लगाने पर जिस्म से जान निकाल देता है मार ही देता है बस  थोड़ी सी साँस चलती रहती है  और जिस्म किसी मशीन सा हो जाता है जो दुनिया के सब काम करता रहता है बस खुद को ही भूल जाता है समझ नहीं आता तब मैं क्या करू  और क्या नहीं ,,,,, खैर हर बार यही पर मैं हार जाती हूँ बार बार हार जाती हूँ ,
मालूम न था इतनी सजाएँ मिलेंगी मुझे
क्या प्यार किया है या गुनाह किया मैंने
सीमा असीम
२८,८,१९ 

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