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Showing posts from 2018
तुम ही हो जिंदगी अब तुम ही हो !! न जाने क्यों ऐसा लगता है कि जैसे तुम मेरे हो सिर्फ मेरे और मैं तुम्हारे चेहरे को गौर से देखती रहती हूँ पल भर को भी पलक झपकाने का दिल नहीं करता है लेकिन प्रिय फिर ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं अकेले ही तुम्हें निभा रही हूँ मैं ही सिर्फ वफा किए जा रही हूँ और तुम्हें तनिक भी फिक्र नहीं होती ? हो सकता है यह मेरा भ्रम हो लेकिन यह भ्रम भी क्यों है ? किसलिए आखिर ? लाख कोशिश के बाद भी मैं नहीं समझ पाती हूँ ! बस मैं इतना जानती हूँ कि जब मैं एकनिष्ठ भावना के साथ तुम्हें प्रेम करती हूँ तो तुम भी तो मेरी ही तरह मुझे प्रेम करते हो न ? प्रिय तुम जानते हो न, समझते हो न कि प्रेम करना तो बहुत आसान है लेकिन इसे निभाना बहुत ही मुश्किल है बहुत ही कठिन है शायद यह बजह हो कि तुम मुश्किलों से घबरा जाते हो  ! मैं तो बस यूं ही सदा तुम्हें प्रेम करती रहूँगी और वफा को निभाती रहूँगी अपने सच्चे मन से ! बहुत ही कठिन डगर है पनघट की लेकिन चलना है मुझे इसी तरह ध्यानमगन होकर ! खुद को बिसराकर ! सिर्फ तुममें ही लीन होकर ! मैं मैं न रही मैं तुम बन गयी और तुम्हारे सारे दुख मेरे ...
आप के प्यार में हम सवरने लगे देख के आप को हम निखरने लगे इस कदर आप से हम को मोहब्बत हुई इस कदर आप से हम को मोहब्बत हुई टूट के बाजुओं में बिखरने लगे आप जो इस तरह से तड़पाएँगे ऐसे आलम में पागल हो जाएँगे वो मिल गया जिसकी कब से तलाश थी बेचैन सी इन सासों में जन्मो की प्यास थी जिस्म से रूह में हम उतरने लगे आप के प्यार में हम सवारने लगे !!
साँसों की डोर  महक उठती है अमृत की रसधर बह उठती है कीचड़ में जैसे कमल खिला हो जब होता है प्रिय साथ तुम्हारा !! \सुनो प्रिय               जो मैं तुम्हें लिखती हूँ न, तो सनम मैं सिर्फ लिखती भर नहीं हूँ बल्कि मैं जीती हूँ तुम्हें ! पल पल हर पल में ! क्या तुम्हें भी यही अहसास होता है जो मैं महसूस करती  हूँ ? क्या तुम भी मुझे यूं ही जीते हो जैसे मैं तुम्हें जीती हूँ ? लेकिन प्रिय मुझे इन सब बातों  से तनिक, रत्ती भर मात्र भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं खुद पर बिशवास करती हूँ मैं जानती हूँ कि मैं प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में .....सिर्फ तुम्हें जीते हुए ही अपने दिन रात गुजरती हूँ मेरे प्रिय तुम समझते हो बस इतना ही काफी है  कि मेरो चाहत को दरकार यही है और कुछ भी नहीं ! तुम मेरे हो या नहीं इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता !  मैं हार चुकी  हूँ अपना सब कुछ  तुम्हारे प्रेम में ....... हर चोट से मैंने खुद को मजबूत किया है हर ज़ख़म को दिल पर महसूस किया है निभाई है हरहाल अपने हिस्से की सच्चाई मैंने सनम प्रेम सिर्फ त...
मैं अक्सर सोचती हूँ की कोई भी पुरुष किसी भी महिला को चीट  करते वक्त यह क्यों नहीं सोचता कि ऐसी ही महिलाएं बहने मेरे घर में भी हैं ! क्या सच में उनके दिल में एक महिला की कोई इज्ज़त नहीं या उसकी भावनाओं की कोई कदर नहीं ! कैसे और किस तरह वो उसकी भावनाओं को कुचल देता है कैसे खुद को हाबी करने के लिए उसे दबा देता है ? बस ऐसे ही प्रश्नों पर आधारित हमारी कुछ रचनाएँ हैं जिन्हें साझा करेंगे .......क्रमशः असीम 
तुम्हारा मुसकुराना
 नमन के दादा और दादी ने अपने जवानी के दिनों को याद करके का सोचा। उन्होंने फैसला किया कि हम फिर से दरिया के किनारे मिलेंगे जहाँ हम पहली बार मिले थे। दादा सुबह जल्दी उठकर तैयार होकर गुलाब लेकर पहुँच गए पर दादी नहीं आयी। दादा जी गुस्से में घर पहुंचकर बोले,"तुम आयी क्यों नहीं, मैं इंतज़ार करता रहा तुम्हारा?" दादी ने भी शर्मा के जवाब दिया,"माँ ने जाने ही नहीं दिया।" नमन  हैरान ........  
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न कोई है न कोई था   जिंदगी में तुम्हारे सिवा   तुम देना साथ मेरा   ओ हमनवाज ओ मेरे हमनवाज सुनो प्रिय              मैं तुम्हारी हूँ और सिर्फ तुम्हारी ........बस तुमसे एक ही गुजारिश है मेरे प्रिय कि तुम कहीं भी रहो , कहीं भी जा बस खुश रहो हमेशा मुस्कुराओ मुझे बहुत अच्छा लगेगा ,,,,,, हाँ प्रिय तुम मेरे हो सिर्फ मेरे ही लेकिन मेरे लिए तो तुम्हारा होना भर ही काफी है ,,,,,, तुम्हें देख लेना ही मेरे लिए खुशी का कारण बन जाता है ,,, मैं उदासी में भी मुस्कुरा देती हूँ मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं खून का बहाव तेज हो जाता है और मेरे बेजान से जिस्म में जान आ जाती है मेरे प्रिय मेरी   सारी खुशियां सिर्फ तुमसे हैं और शायद दुख भी.................प्रिय क्या तुम जानते हो कि जब तुम सामने से दिख जाते हो तो दिल को एक अलग से किस्म का सकूँ आ जाता है मेरी बेचैनी घबराहट परेशानी और तकलीफ़ें न जाने कहाँ छूमंतर हो जाती हैं ....न जाने कहाँ बिला जाती हैं ? भले ही तुम मुझे देख पा रहे हो या नहीं फिर...
दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है  इस दर्द की दवा तुम हो प्रिय सिर्फ तुम सुनो प्रिय  आज मन बहुत उदास है बहुत ज्यादा उदास है किसी भी काम में मन ही नहीं लग रहा है घबराहट से भरा मन सब कुछ छोड़ कर भाग जाना चाहता है क्या तुम भी उदास हो ? क्या तुम्हारा मन नहीं लग रहा है ? प्रिय यह क्यों हो रहा है मुझे कैसा आभास हो रहा है ? क्या कुछ गलत हो रहा है जो मुझे तकलीफ से भर रहा है .... इतनी पीड़ा ...इतना कष्ट ....नहीं पता क्यो और किसलिए ? तुम क्यों जाते हो ? तुम क्यों जाना चाहते हो ? तुम क्यों भटकते हो ? आखिर क्या पा लोगे ? क्या मिल जाएगा तुम्हें ? क्या तुम मुझे दर्द दुख तकलीफ देकर खुश रह सकते हो ? मेरे बहते हुए आँसू और भी ज्यादा बह रहे हैं ...प्रिय तुम मुझे साथ में ही रखा करो ...क्यों करते हो क्षण भर को भी दूर ....क्यों आखिर क्यों मेरे प्रीतम .....आ जाओ तुम अभी इसी वक्त ....फिर कभी मत जाना ...आज पता है मन इतना घबरा रहा था कि मैं यूं ही घर से बाहर निकल गयी थोड़ी देर को खुली हवा में टहलने को .....थोड़ी देर को शायद मन बहल जाये ....प्रिय मैं बस एक बात पुछना चाहती हूँ कि तुम जानते हो...
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ये तो घर है प्रेम का ............ सुनो प्रिय                तुमसे अब कुछ भी कहने का दिल ही नहीं चाहता ,,,कुछ कहना ही नहीं चाहता है,,,,, मेरा मन इस कदर भरा हुआ है कि आँखें लबालब है जो हर समय बरस पड़ने को आतुर रहती है ......जितना भी रोती हूँ उससे भी ज्यादा रोने को जी चाहता है .....बस एक बात समझ नहीं आती है कि आखिर तुम ऐसे कैसे हो गए ? तुम ऐसे कैसे बन गए ? क्या खूबी थी उसमें जो उस राह पर चल पड़े ? क्या तुम्हारी अंतरात्मा यह सब बिना किसी तकलीफ के स्वीकार कर लेती है ? क्या तुम्हें कोई भी फर्क नहीं पड़ता ? यह मेरी शिकायत या फिर कोई गिला नहीं है बल्कि मेरा प्रेम है जो तुम्हें भटकने से बचाना चाहता है सिर्फ इतना सा ही और कुछ भी नहीं ? जब मेरे समर्पण में कोई कमी नहीं तो और क्या ज्यादा पाने की चाहत ......प्रिय मैं सच कह रही हूँ एक दिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होगा, मैं भी नहीं ............हाँ प्रिय यही एक सच है और सबसे बड़ा सच .........मैं अपना प्रेम अपने अंतस में कहीं छुपा लूँगी ....कहीं भी क्योंकि प्रेम का मतलब ही नहीं तुम ...
होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएंगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है? राय साहब ने हाथ बाँध कर कहा-हाँ सरकार, होली है। बुल- खूब लाल रंग खेलता है? राय साहब- हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार है। साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बु...
कीमत थप्पड़  रोज शाम बगीचे में घूमने जाना उनकी आदत में शामिल था |  आज उनके साथ मे मिश्रा जी भी थे    कुछ देर टहल कर उनसे बतियाने लगा | शिवरात्रि का पावन दिन पहला था | आज कुछ विशेष रौनक थी | कुछ एक गुब्बारे-कुल्फी वाले भी आ जुटे थे | मिश्रा जी से बतियाते हुए आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े एक  कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा : "बाबूजी पैसे" ?  मैं हतप्रभ: "कैसे पैसे" ? उसने पास खड़े कुल्फी खाते एक बच्चे की तरफ़ इशारा कर के कहा : "आपका नाम ले कुल्फी ले गया है, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे" |  मुझे गुस्सा आ गया बच्चे के पास गया और दो थप्पड़ जड़ दिए और कहा "मुफ्त की कुल्फी खाते शर्म नही आती" ? वह बोला : "मुफ्त की कहाँ ? इसके बदले थप्पड़ खाने के लिए तो आपके पास खड़ा था वरना भाग ना जाता"?
प्रेम लघुकथा मेहंदी लड़के ने धीमी होती रेल की खिड़की के बाहर देखा तो लगा साक्षात चाँद धरा पर उतर आया हो| अलसी भौर में उनींदे नयन सीप | अपलक देखता ही रह गया | कुछ संयत हो, हाथ में पानी की केतली ले उतरा और वहां चला, जहाँ वह मानक सौंदर्य मूर्ति जल भर रही थी | फासला कम होता गया, सम्मोहन बढ़ता गया | समक्ष पहुँचने तक दोनों के मध्य स्मित अवलंबित नजर सेतु स्थापित हो चुका था | भावनाओं का परिवहन होने लगा | लड़के ने देखा लड़की की पगतली पर महावर रची थी | किसी परिणय यात्रा की सदस्या थी | बालों से चमेली की खुशबू का ज्वार सा उठा, लड़का मदहोश हो गया | कलाई थाम ली, हथेली पर रचे मेहंदी के बूटों पर अधर रख दिये | लड़की की पलकें गिर गई | तभी लड़की के पास खड़ा पानी भरता एक मुच्छड़ मुड़ा | अग्नि उद्वेलित नजरों से घूरा और अपने हाथ को लडके की कनपट्टी की दिशा में घुमा दिया | लड़का झुका और स्वयं को बचाया | इतने में उसकी ट्रेन खिसकने लगी | वह लपक कर चढ़ गया | दूसरी तरफ़ उनकी की ट्रेन भी चल पड़ी | वह मुच्छड़ के साथ घसीटती सी चली | गति पकड़ती ट्रेन की खिड़की से एक मेहंदी रची हथेली हिल रही थी |...
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मैं इतनी ज़ोर से नाची आज  कि घुंघरू टूट गए !!   बिछा दो राह में बस फूल ही फूल  कि साजन घर आ गए हैं  सुनो प्रिय,             कोई जरूरी तो नहीं है न कि तुम चाहों मुझे उतना ही कि जितना मैं तुम्हें चाहती हूँ .....जरूरी तो नहीं कि निभाओ तुम उतनी ही वफा कि जितनी मैं वफा निभाती हूँ ,,,,,,हाँ प्रिय बहुत काफी है मेरा चाहना ही तुम्हें क्योंकि प्रेम कभी मांगा नहीं जाता, कभी पाया नहीं जाता सिर्फ देने का नाम ही तो प्रेम है,, लूटा देना अपना सब कुछ अपने प्रिय के नाम पर बस यही प्रेम है ,,,,,प्रेम के लिए बर्बाद कर देना मिटा देना बिना किसी स्वार्थ के कि प्रेम है है यह कोई सौदेबाजी नहीं है कोई व्यापार नहीं है .....मेरे प्रिय तुम तो मानसिक रूप से हरदम मेरे साथ ही रहते हो क्योंकि मैं पल भर को भी तुमसे दूर जाती ही नहीं जोड़े रखती हूँ अपने मन का तुमहरे मन से बंधन ,,,,जग के समाज के बंधन वाले बंधन की मेरे प्रेम को दरकार ही नहीं है ..........कर का मनका छोड़ के अब मन का मनका फेरती रहती हूँ प्रिय आपके लिए अपनी जान नियोछावर किए रहती ...
डुबाया है इस कदर मुझे सनम आपकी मोहब्बत ने  उबरने का सोचती भी हूँ तो कुछ और डूब जाती हूँ ! रग रग में जो बहता है वो तो लहू है मेरे सनम  आँख से बहने वाले इस दर्द को मैं क्या नाम दूँ !!  सुनो प्रिय             आज इतने दिनों के बाद एक एक शब्द जोड़ कर तुम्हें लिखने का दिल किया है ॥....न जाने क्यों लगता है जैसे कि तुम सिर्फ मेरे हो ,,,,,,दिल से आवाज आती है कि तुम मुझे उतना ही प्रेम करते  हो जितना मैं करती हूँ लेकिन यह फांस की तरह से क्या दिल में चुभता रहता है प्रिय यकीन जानों यह बहुत दर्द करता है बहुत तकलीफ देता है ,,,,मेरे प्रिय क्या इस तकलीफ को तुम भी महसूस करते हो ?मैं इस दर्द से निजात तो नहीं पाना चाहती हूँ परंतु इस दर्द के साथ जीना तो मरने से भी बदतर है, समझ ही नहीं आता है कभी कभी कि क्या मैं जीवित भी हूँ या नहीं ?  मरने के समान जीते हुए भी मैं तुम्हें खुश देखकार पल भर को जी उठती हूँ और फिर उसी अवस्था में आ जाती हूँ ..............सारी रात उस चमकती हुई हरी बत्ती को देखते हुए गुजारती हूँ और दिन तुम्हारा मनन करते हुए ......प्र...
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हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ........ सुनो प्रिय,                 मैं सिर्फ इतना जानती हूँ कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ बस और कुछ भी नहीं ,,,,इसके सिवा कुछ और जानने समझने की चाहत भी नहीं है न ही कभी होगी ,,,मैं तुमसे कल भी उतना प्रेम करती थी और आज भी उतना ही ....मेरे लबों पर कल भी तुम्हारा नाम था ,,,, आज भी है और कल भी रहेगा ,,,आँखों में नमी और दिल में दुआएं भी वैसी ही हैं ,,मेरी बाहें आज भी उसी तरह से तुम्हें अपनी बाहों में भरने को उतावली रहती हैं और एक झलक पाने को आँखें हरदम इंतजार करती हैं ,,,मैं सिर्फ इतना ही जानती हूँ कि तुम मेरे प्रेमी हो और मैं तुम्हारी प्रेमिका ......कल भी कुछ और जानने की तमन्ना नहीं थी और न ही आज ॥न कभी होगी ही ,, बस इतना रहम तुम भी करना मुझे कुछ बताने समझाने की कोशिश मत करना क्योंकि मैंने अपने सच्चे दिल से तुम्हें चाहा और तुम्हें पाया फिर कैसी किसी और बात की गुंजाइश बची ,,,,,तुम्हें पा लेना ही मेरे सच्चे प्रेम का सूचक है मेरी सच्चाई है ,,,.... मेरे दिल की गहराइयों में ब...
कि यह प्यार है गिला नहीं  सुनो प्रिय             तुम्हें देखते ही न जाने कितना प्रेम उमड़ पड़ता है जो मन में भरा होता है न उसे सब तुम्हारे ऊपर उड़ेल देने को जी चाहता है तुम यूं ही सामने बैठे रहो पल भर को भी तुमसे दूर जाने का दिल ही  नहीं करता है ,,,,लेकिन मैं तुम्हें अपनी नजरों से दिल में बसाकर एक बार फिर दूर हो जाती हूँ पर दूर जाकर भी कहाँ दूर जा पाती हूँ बल्कि और ज्यादा करीब आ जाती हूँ बेहद करीब इतना कि तुम मेरी साँसों में रहने लगते हो तभी तो तुम हो तो हम हैं अन्यथा हमारा होना कोई होना नहीं है ,,, हर पल तुम्हारी आरजू रहती है न जाने यह कैसी बेकरारी है जो न कही जाती है और न ही सही जाती है,,,तभी तो मैं रचती रहती हूँ तुम्हें ही शब्द दर शब्द,, अपनी गजल में गीत में कहानी में और कविता में यकीनन बहुत ही मुश्किल है तुम्हारे बिना जीना, रहना ,,, प्रिय यूं ही तुम्हें चाहते रहेंगे ...मिटते रहेंगे .... प्रिय मेरी जो यह मोहब्बत है न इसकी कभी थाह लेने कि कोशिश मत करना क्योंकि यह अथाह है जितना लुटाती हूँ उतनी ही और ज्यादा उमड़ने लगती है ,,सागर कि लहरे त...
आज मैं बहुत दिनों के बाद घर से निकली ! न जाने यह क्या हुआ है मैं खुद को जी ही नहीं पाती हूँ तुम्हें ही जीती रहती हूँ और न जाने यह हो कैसे जाता है कि मुझे तुम्हारे किसी भी सुख या दुख के बारे में पता कैसे चल जाता है ! न जाने कौन सी वो अद्रश्य सी डोरी है जो मुझे हर पल तुम्हारी तरफ खींचती रहती है !तुमसे बात हुई और सारे दुख दूर भाग गए मैं मुस्करा दी और आँसू न जाने कहाँ उड गए 1 कितनी बीमार थी वो बीमारी भी फुर्र से कहीं गायब हो गयी !   मेरे प्रेम के सच्चे सहचर प्रिय आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ,, सुनोगे न ? वो जो मेरा प्रेम का मंदिर है न उसका मान बनाए रखना ! बस इतना ही कहना है कि उसे अपवित्र मत होने देना क्योंकि वहाँ उसकी रक्षा चारो तरफ से घेरे खड़े मेरे भाई देव उसकी पहरेदारी कर रहे हैं ! और साक्षात ईश्वर हमें आशीर्वाद देने को तत्पर हैं साथ ही माँ प्रकृति अपना आँचल बिछाए हमें सुख की सकूँ की छांव दे रही है ! सुनो नाराज मत होना !  मुस्करा दो न ?  बस एक बार ज़ोर से खिलखिला कर, कि उस मुस्कान की खुशी मेरे चेहरे तक आ जाये !  तो मुस्कराओ ??
वो लड़की सुना तुमने ? दामोदर बाबू की लड़की भाग गई।’’ ‘‘कौन? बड़ी वाली?’’ ‘‘पता नहीें, तीनों की तीनों तो कठैला जवान थीं।’’ ‘‘जब कोई पच्चीस बरस तक कुँवारी पठिया घर में बाँधे रहे, तो भागेगी नहीं? घास खानेवाली बकरी तो छह महीने में ही मिमियाने लगती है।….कुछ पता चला, किसके साथ भागी है?’’ ‘‘मुहल्ले के सारे परवाज तो वहीं हैं।’’ ‘‘लौडिया तो छुपा रुस्तम निकली!’’ ‘‘बेचारे दामोदर बाबू की इज्जत धूल में मिल गई। भागी तो वह थी दो दिन पहले, लेकिन बात आज खुली है।’’ ‘‘यह चिड़िया तो तुम्हारे पड़ोस की थीं। तुमने दाना नहीं डाला?’’ ‘‘यार, वह तो किसी की मुँडेर पर बैठती ही नहीं थी। जाने कैसे किसके जाल में फँस गई।’’ ‘‘रत्तो ! दामोदर की बेटी ने तो हद कर दी। बाप की पगड़ी का जरा भी खयाल नहीं रखा। तुम्हारी सोनी तो बीस पार कर रही है। जरा नजर रखियो। जमाना जाने कैसा हो रहा है!’’ ‘‘ दीदी, जमाने को तो खराब कर रखा है इन सिनेमावालों ने। यथार्थ-चित्रण के नाम पर पर्दे पर ऐसी-ऐसी हरकतें होती हैं कि….और वही उल्लंग लपक-चिपक दुहराई  जाती है टी.वी. के पर्दे पर भी।’’ ‘‘हाँ, उससे जवान लड़के-लड़कियों का ...
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछुड़े पियारे  उन्हीं से नेह लगा है हमन को बेकरारी क्या !! सुनो प्रिय                ये जो पल पल तुमसे बात करती रहती हूँ न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे दिल में कुछ फंस सा गया है गले में कुछ अटक सा गया है और जुबान कुछ कहते कहते अटक सी गई है फिर भी मैं तुमसे कहती रहती हूँ कुछ न कुछ और तुम सुनते रहते हो यूं ही चुपचाप बैठे हुए और कभी तुम कहते हो तो मैं तुम्हें अपलक देखती रहती हूँ मुस्कराते हुए लेकिन प्रिय ये हंसने  खिलखिलाने के दिन बड़ी जल्दी से निकल जाते हैं न बचे रह जाते हैं तो सिर्फ आँखों में आँसू ,,,, जो नम किए रहते हैं मेरा मन  ,,,,,,जब मैं बेचैन होती हूँ तो मेरे मन सिर्फ इतना सा ख्याल आता है कि तुम खुश तो हो न ,,,,,कहीं कोई तकलीफ तो नहीं .......न जाने कैसी बेबसी सी है जो कुछ कुछ मन पर छाई हुई है इन दिनों ॥....मेरे प्रिय मुझे याद आता कि वो तुम्हारा सिगरेट के काश लेते हुए आधी सिगरेट को यूं ही सुलगते हुए फेंक देना कितनी देर तक वो यूं ही सुलगती रहती होगी ? न जाने कितनी देर ...