ये तो घर है प्रेम का ............
सुनो प्रिय
तुमसे अब कुछ भी कहने का दिल ही नहीं चाहता ,,,कुछ कहना ही नहीं चाहता है,,,,, मेरा मन इस कदर भरा हुआ है कि आँखें लबालब है जो हर समय बरस पड़ने को आतुर रहती है ......जितना भी रोती हूँ उससे भी ज्यादा रोने को जी चाहता है .....बस एक बात समझ नहीं आती है कि आखिर तुम ऐसे कैसे हो गए ? तुम ऐसे कैसे बन गए ? क्या खूबी थी उसमें जो उस राह पर चल पड़े ? क्या तुम्हारी अंतरात्मा यह सब बिना किसी तकलीफ के स्वीकार कर लेती है ? क्या तुम्हें कोई भी फर्क नहीं पड़ता ? यह मेरी शिकायत या फिर कोई गिला नहीं है बल्कि मेरा प्रेम है जो तुम्हें भटकने से बचाना चाहता है सिर्फ इतना सा ही और कुछ भी नहीं ? जब मेरे समर्पण में कोई कमी नहीं तो और क्या ज्यादा पाने की चाहत ......प्रिय मैं सच कह रही हूँ एक दिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होगा, मैं भी नहीं ............हाँ प्रिय यही एक सच है और सबसे बड़ा सच .........मैं अपना प्रेम अपने अंतस में कहीं छुपा लूँगी ....कहीं भी क्योंकि प्रेम का मतलब ही नहीं तुम समझते तो तुम्हें क्या कहा जाये >>..... तुम अपने जरा से सुख की खातिर कितने लोगों को दुख पहुंचा रहे हो इसका तुम्हें रत्ती भर भी भान है ....नहीं न ......
प्रिय सुनो अगर तुम मुझे कुछ भी नहीं कहते हो, तब भी मैं तुम्हारे मन की एक एक बात समझ जाती हूँ .....क्योंकि मैंने तो तुमसे सच्चा दिल लगाया था कोई खेल नहीं खेल खेला था ....लेकिन फिर एक बात सोचती हूँ कि तुमने भी अगर दिल लगाया होता, तो तुम मुझसे पहले दिन से ही ऐसी बातें नहीं करते .....मैं उस समय सोचती थी कि तुम सही हो जाओगे ...सुधर जाओगे ,,,,, मेरा प्रेम तुम्हें एक अच्छा और सच्चा इंसान बना लेगा लेकिन मैं गलत निकली .....आज मैं बड़े दुख के साथ कह रही हूँ कि हर तरह से समर्पण के बाद मैं हार गयी हाँ मैं हार गयी .....मैं नहीं हारी बल्कि तुमने मेरे प्रेम को हरा दिया मेरा प्रेम ,,कर दिया उसका इतना अपमान कि अब वो कभी भी जीतना नहीं चाहता .हाँ कभी भी नहीं ..प्रिय अब कोई भी फूल नहीं खिलेगा यहाँ क्योंकि तुमने मेरा उपवन उजाड़ दिया है यहाँ वहाँ पौधे लगाने की खातिर ......प्रिय तुम प्रेम नहीं बो रहे बल्कि नफरत । वितृष्णा ,,, घृणा का बीज बोते फिर रहे हो, तुम कभी भी अपने मकसद में सफल नहीं हो पाओगे ...कभी भी नहीं ....ध्यान रखना जब प्रेम नफरत में बदलता है तो वो कभी भी समर्पण में नहीं आता ...कभी भी नफरत प्रेम में तब्दील नहीं होती ......कभी भी नहीं ..........मेरा दिल अब भर गया है ........तुम पल पल मुझसे छीनते रहे और मैं बिना किसी बात की परवाह किए सब देती रही लेकिन अब नहीं, अब और नहीं .....बस ....जाओ तुम्हें जहां जाना है जाओ लेकिन कभी न लौट के आने के लिए जाओ ............क्रमशः
सीमा असीम
सुनो प्रिय
तुमसे अब कुछ भी कहने का दिल ही नहीं चाहता ,,,कुछ कहना ही नहीं चाहता है,,,,, मेरा मन इस कदर भरा हुआ है कि आँखें लबालब है जो हर समय बरस पड़ने को आतुर रहती है ......जितना भी रोती हूँ उससे भी ज्यादा रोने को जी चाहता है .....बस एक बात समझ नहीं आती है कि आखिर तुम ऐसे कैसे हो गए ? तुम ऐसे कैसे बन गए ? क्या खूबी थी उसमें जो उस राह पर चल पड़े ? क्या तुम्हारी अंतरात्मा यह सब बिना किसी तकलीफ के स्वीकार कर लेती है ? क्या तुम्हें कोई भी फर्क नहीं पड़ता ? यह मेरी शिकायत या फिर कोई गिला नहीं है बल्कि मेरा प्रेम है जो तुम्हें भटकने से बचाना चाहता है सिर्फ इतना सा ही और कुछ भी नहीं ? जब मेरे समर्पण में कोई कमी नहीं तो और क्या ज्यादा पाने की चाहत ......प्रिय मैं सच कह रही हूँ एक दिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होगा, मैं भी नहीं ............हाँ प्रिय यही एक सच है और सबसे बड़ा सच .........मैं अपना प्रेम अपने अंतस में कहीं छुपा लूँगी ....कहीं भी क्योंकि प्रेम का मतलब ही नहीं तुम समझते तो तुम्हें क्या कहा जाये >>..... तुम अपने जरा से सुख की खातिर कितने लोगों को दुख पहुंचा रहे हो इसका तुम्हें रत्ती भर भी भान है ....नहीं न ......
प्रिय सुनो अगर तुम मुझे कुछ भी नहीं कहते हो, तब भी मैं तुम्हारे मन की एक एक बात समझ जाती हूँ .....क्योंकि मैंने तो तुमसे सच्चा दिल लगाया था कोई खेल नहीं खेल खेला था ....लेकिन फिर एक बात सोचती हूँ कि तुमने भी अगर दिल लगाया होता, तो तुम मुझसे पहले दिन से ही ऐसी बातें नहीं करते .....मैं उस समय सोचती थी कि तुम सही हो जाओगे ...सुधर जाओगे ,,,,, मेरा प्रेम तुम्हें एक अच्छा और सच्चा इंसान बना लेगा लेकिन मैं गलत निकली .....आज मैं बड़े दुख के साथ कह रही हूँ कि हर तरह से समर्पण के बाद मैं हार गयी हाँ मैं हार गयी .....मैं नहीं हारी बल्कि तुमने मेरे प्रेम को हरा दिया मेरा प्रेम ,,कर दिया उसका इतना अपमान कि अब वो कभी भी जीतना नहीं चाहता .हाँ कभी भी नहीं ..प्रिय अब कोई भी फूल नहीं खिलेगा यहाँ क्योंकि तुमने मेरा उपवन उजाड़ दिया है यहाँ वहाँ पौधे लगाने की खातिर ......प्रिय तुम प्रेम नहीं बो रहे बल्कि नफरत । वितृष्णा ,,, घृणा का बीज बोते फिर रहे हो, तुम कभी भी अपने मकसद में सफल नहीं हो पाओगे ...कभी भी नहीं ....ध्यान रखना जब प्रेम नफरत में बदलता है तो वो कभी भी समर्पण में नहीं आता ...कभी भी नफरत प्रेम में तब्दील नहीं होती ......कभी भी नहीं ..........मेरा दिल अब भर गया है ........तुम पल पल मुझसे छीनते रहे और मैं बिना किसी बात की परवाह किए सब देती रही लेकिन अब नहीं, अब और नहीं .....बस ....जाओ तुम्हें जहां जाना है जाओ लेकिन कभी न लौट के आने के लिए जाओ ............क्रमशः
सीमा असीम

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