दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है
इस दर्द की दवा तुम हो प्रिय सिर्फ तुम
सुनो प्रिय
आज मन बहुत उदास है बहुत
ज्यादा उदास है किसी भी काम
में मन ही नहीं लग रहा है घबराहट से भरा मन सब कुछ छोड़ कर भाग जाना चाहता है क्या तुम
भी उदास हो ? क्या तुम्हारा मन नहीं लग रहा है ?
प्रिय यह क्यों हो रहा है मुझे कैसा आभास हो रहा है ?
क्या कुछ गलत हो रहा है जो मुझे तकलीफ से भर रहा है ....इतनी
पीड़ा ...इतना कष्ट ....नहीं पता क्यो और किसलिए ? तुम क्यों जाते हो ?
तुम क्यों जाना चाहते हो ? तुम क्यों भटकते हो ?
आखिर क्या पा लोगे ? क्या मिल जाएगा तुम्हें ?
क्या तुम मुझे दर्द दुख तकलीफ देकर खुश रह सकते हो ? मेरे बहते हुए आँसू और
भी ज्यादा बह रहे हैं ...प्रिय तुम मुझे साथ में ही रखा करो ...क्यों करते हो क्षण
भर को भी दूर ....क्यों आखिर क्यों मेरे प्रीतम .....आ जाओ तुम अभी इसी वक्त ....फिर
कभी मत जाना ...आज पता है मन इतना घबरा रहा था कि मैं यूं ही घर से बाहर निकल गयी
थोड़ी देर को खुली हवा में टहलने को .....थोड़ी देर को शायद मन बहल जाये ....प्रिय मैं
बस एक बात पुछना चाहती हूँ कि तुम जानते हो ...सबकुछ समझते हो फिर भी तुम मुझे अथाह
दुख के सागर में धकेल देते हो इतनी गहराई में कि वहाँ से उबरना नामुमकिन हो जाता है
और मैं उसमें डूबी रहती हूँ .....अशकों से भरी आँखों से सब धुंधला दिखने लगता है ....आओ
प्रिय तुम आ जाओ ...आज दिल में बहुत दर्द है वो दर्द ॥वो तकलीफ क्या तुम्हें भी सता
रही है ...मैं जानना चाहती हूँ ....
दर्द के इस सफर में हमसफर मेरा
हाथ थाम ले
चल मेरे साथ साथ मुझे तू कांधे
का सहारा दे !!!
सीमा असीम
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