साँसों की डोर  महक उठती है
अमृत की रसधर बह उठती है
कीचड़ में जैसे कमल खिला हो
जब होता है प्रिय साथ तुम्हारा !!
\सुनो प्रिय
              जो मैं तुम्हें लिखती हूँ न, तो सनम मैं सिर्फ लिखती भर नहीं हूँ बल्कि मैं जीती हूँ तुम्हें ! पल पल हर पल में ! क्या तुम्हें भी यही अहसास होता है जो मैं महसूस करती  हूँ ? क्या तुम भी मुझे यूं ही जीते हो जैसे मैं तुम्हें जीती हूँ ? लेकिन प्रिय मुझे इन सब बातों  से तनिक, रत्ती भर मात्र भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं खुद पर बिशवास करती हूँ मैं जानती हूँ कि मैं प्रेम में हूँ सिर्फ तुम्हारे प्रेम में .....सिर्फ तुम्हें जीते हुए ही अपने दिन रात गुजरती हूँ

मेरे प्रिय तुम समझते हो बस इतना ही काफी है  कि मेरो चाहत को दरकार यही है और कुछ भी नहीं ! तुम मेरे हो या नहीं इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता !  मैं हार चुकी  हूँ अपना सब कुछ  तुम्हारे प्रेम में .......

हर चोट से मैंने खुद को मजबूत किया है
हर ज़ख़म को दिल पर महसूस किया है
निभाई है हरहाल अपने हिस्से की सच्चाई
मैंने सनम प्रेम सिर्फ तुमसे ही किया है !!
 सीमा असीम










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