तुम ही हो
जिंदगी अब
तुम ही हो !!
न जाने क्यों ऐसा लगता है कि जैसे तुम मेरे हो सिर्फ मेरे और मैं तुम्हारे चेहरे को गौर से देखती रहती हूँ पल भर को भी पलक झपकाने का दिल नहीं करता है लेकिन प्रिय फिर ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं अकेले ही तुम्हें निभा रही हूँ मैं ही सिर्फ वफा किए जा रही हूँ और तुम्हें तनिक भी फिक्र नहीं होती ? हो सकता है यह मेरा भ्रम हो लेकिन यह भ्रम भी क्यों है ? किसलिए आखिर ? लाख कोशिश के बाद भी मैं नहीं समझ पाती हूँ ! बस मैं इतना जानती हूँ कि जब मैं एकनिष्ठ भावना के साथ तुम्हें प्रेम करती हूँ तो तुम भी तो मेरी ही तरह मुझे प्रेम करते हो न ?
प्रिय तुम जानते हो न, समझते हो न कि प्रेम करना तो बहुत आसान है लेकिन इसे निभाना बहुत ही मुश्किल है बहुत ही कठिन है शायद यह बजह हो कि तुम मुश्किलों से घबरा जाते हो  ! मैं तो बस यूं ही सदा तुम्हें प्रेम करती रहूँगी और वफा को निभाती रहूँगी अपने सच्चे मन से ! बहुत ही कठिन डगर है पनघट की लेकिन चलना है मुझे इसी तरह ध्यानमगन होकर ! खुद को बिसराकर ! सिर्फ तुममें ही लीन होकर !
मैं मैं न रही
मैं तुम बन गयी
और तुम्हारे सारे दुख मेरे हो गए और सुख ?
सीमा असीम  

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