कि यह प्यार है गिला नहीं सुनो प्रिय तुम्हें देखते ही न जाने कितना प्रेम उमड़ पड़ता है जो मन में भरा होता है न उसे सब तुम्हारे ऊपर उड़ेल देने को जी चाहता है तुम यूं ही सामने बैठे रहो पल भर को भी तुमसे दूर जाने का दिल ही नहीं करता है ,,,,लेकिन मैं तुम्हें अपनी नजरों से दिल में बसाकर एक बार फिर दूर हो जाती हूँ पर दूर जाकर भी कहाँ दूर जा पाती हूँ बल्कि और ज्यादा करीब आ जाती हूँ बेहद करीब इतना कि तुम मेरी साँसों में रहने लगते हो तभी तो तुम हो तो हम हैं अन्यथा हमारा होना कोई होना नहीं है ,,, हर पल तुम्हारी आरजू रहती है न जाने यह कैसी बेकरारी है जो न कही जाती है और न ही सही जाती है,,,तभी तो मैं रचती रहती हूँ तुम्हें ही शब्द दर शब्द,, अपनी गजल में गीत में कहानी में और कविता में यकीनन बहुत ही मुश्किल है तुम्हारे बिना जीना, रहना ,,, प्रिय यूं ही तुम्हें चाहते रहेंगे ...मिटते रहेंगे .... प्रिय मेरी जो यह मोहब्बत है न इसकी कभी थाह लेने कि कोशिश मत करना क्योंकि यह अथाह है जितना लुटाती हूँ उतनी ही और ज्यादा उमड़ने लगती है ,,सागर कि लहरे त...
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आज मैं बहुत दिनों के बाद घर से निकली ! न जाने यह क्या हुआ है मैं खुद को जी ही नहीं पाती हूँ तुम्हें ही जीती रहती हूँ और न जाने यह हो कैसे जाता है कि मुझे तुम्हारे किसी भी सुख या दुख के बारे में पता कैसे चल जाता है ! न जाने कौन सी वो अद्रश्य सी डोरी है जो मुझे हर पल तुम्हारी तरफ खींचती रहती है !तुमसे बात हुई और सारे दुख दूर भाग गए मैं मुस्करा दी और आँसू न जाने कहाँ उड गए 1 कितनी बीमार थी वो बीमारी भी फुर्र से कहीं गायब हो गयी ! मेरे प्रेम के सच्चे सहचर प्रिय आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ,, सुनोगे न ? वो जो मेरा प्रेम का मंदिर है न उसका मान बनाए रखना ! बस इतना ही कहना है कि उसे अपवित्र मत होने देना क्योंकि वहाँ उसकी रक्षा चारो तरफ से घेरे खड़े मेरे भाई देव उसकी पहरेदारी कर रहे हैं ! और साक्षात ईश्वर हमें आशीर्वाद देने को तत्पर हैं साथ ही माँ प्रकृति अपना आँचल बिछाए हमें सुख की सकूँ की छांव दे रही है ! सुनो नाराज मत होना ! मुस्करा दो न ? बस एक बार ज़ोर से खिलखिला कर, कि उस मुस्कान की खुशी मेरे चेहरे तक आ जाये ! तो मुस्कराओ ??
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वो लड़की सुना तुमने ? दामोदर बाबू की लड़की भाग गई।’’ ‘‘कौन? बड़ी वाली?’’ ‘‘पता नहीें, तीनों की तीनों तो कठैला जवान थीं।’’ ‘‘जब कोई पच्चीस बरस तक कुँवारी पठिया घर में बाँधे रहे, तो भागेगी नहीं? घास खानेवाली बकरी तो छह महीने में ही मिमियाने लगती है।….कुछ पता चला, किसके साथ भागी है?’’ ‘‘मुहल्ले के सारे परवाज तो वहीं हैं।’’ ‘‘लौडिया तो छुपा रुस्तम निकली!’’ ‘‘बेचारे दामोदर बाबू की इज्जत धूल में मिल गई। भागी तो वह थी दो दिन पहले, लेकिन बात आज खुली है।’’ ‘‘यह चिड़िया तो तुम्हारे पड़ोस की थीं। तुमने दाना नहीं डाला?’’ ‘‘यार, वह तो किसी की मुँडेर पर बैठती ही नहीं थी। जाने कैसे किसके जाल में फँस गई।’’ ‘‘रत्तो ! दामोदर की बेटी ने तो हद कर दी। बाप की पगड़ी का जरा भी खयाल नहीं रखा। तुम्हारी सोनी तो बीस पार कर रही है। जरा नजर रखियो। जमाना जाने कैसा हो रहा है!’’ ‘‘ दीदी, जमाने को तो खराब कर रखा है इन सिनेमावालों ने। यथार्थ-चित्रण के नाम पर पर्दे पर ऐसी-ऐसी हरकतें होती हैं कि….और वही उल्लंग लपक-चिपक दुहराई जाती है टी.वी. के पर्दे पर भी।’’ ‘‘हाँ, उससे जवान लड़के-लड़कियों का ...
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न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछुड़े पियारे उन्हीं से नेह लगा है हमन को बेकरारी क्या !! सुनो प्रिय ये जो पल पल तुमसे बात करती रहती हूँ न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे दिल में कुछ फंस सा गया है गले में कुछ अटक सा गया है और जुबान कुछ कहते कहते अटक सी गई है फिर भी मैं तुमसे कहती रहती हूँ कुछ न कुछ और तुम सुनते रहते हो यूं ही चुपचाप बैठे हुए और कभी तुम कहते हो तो मैं तुम्हें अपलक देखती रहती हूँ मुस्कराते हुए लेकिन प्रिय ये हंसने खिलखिलाने के दिन बड़ी जल्दी से निकल जाते हैं न बचे रह जाते हैं तो सिर्फ आँखों में आँसू ,,,, जो नम किए रहते हैं मेरा मन ,,,,,,जब मैं बेचैन होती हूँ तो मेरे मन सिर्फ इतना सा ख्याल आता है कि तुम खुश तो हो न ,,,,,कहीं कोई तकलीफ तो नहीं .......न जाने कैसी बेबसी सी है जो कुछ कुछ मन पर छाई हुई है इन दिनों ॥....मेरे प्रिय मुझे याद आता कि वो तुम्हारा सिगरेट के काश लेते हुए आधी सिगरेट को यूं ही सुलगते हुए फेंक देना कितनी देर तक वो यूं ही सुलगती रहती होगी ? न जाने कितनी देर ...
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चाँद के आने से जो हल्की सी मुस्कान की रेखा आती है बस वही तो जिंदगी है, हाँ सिर्फ उतनी सी ही जिंदगी है !! सुनो प्रिय, जब मैं तुम्हें उकेरने लगती हूँ तब वो रब स्वयं आकर मेरी सामने बैठ जाते हैं मंद मंद मुस्कराते हुए और मैं रचने लगती हूँ एक विलक्षण संसार जहां तुम होते हो मैं होती हूँ और होता है .........तुम और मैं मिलकर बन जाता है हम .........वहाँ सिर्फ हम होते हैं न्सिर्फ हम ,,,,,,,ओ मेरे प्रिय ,मेरे दिल पर एकक्षत्र राज करने वाले चाँद जब तुम चंद पलों के लिए आसमा में आ जाते हो न तो पूरी धरती उस रोशनी से चमक उठती है ....अंधेरी रात में कोहरे में छुपे रात्रि के वे पल स्वयं पर गर्व कर उठते हैं और पल भर को तो मानों ये धरती ये आसमा ये रात का समय सब कुछ ठहर जाता है .....थिर हो जाता है ...और सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही पुष्प वर्षा करने लगता है और उस सुगंध से महमहा उठता है पूरा वातावरण ......मैं बावरी सी होकर सिमट जाती हूँ खुद की ही बाहों में .... ये सच है कि मुझे प्रेम है तुमसे सच्चा प्रेम ....ये दिल की लगी है कोई दिल्ल...
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आपका नाम ले लेकर हमने अपनी रातों को संवारा है कभी गुजारा है अमावस्या की रात को चाँद की राह में !! सुनो प्रिय, रात तो गुजर गयी रोशनी की एक चमक के लिए क्योंकि अमावस्या की रात चाँद आसमा में आता ही नहीं ! न गीत रचे जाते हैं न कोई रचना बस इंतजार होता है सुबह की पहली किरण का ! सर्दियों की रातें यूं ही बहुत अधेरी और सर्द होती हैं ! एक झलक चाँद की पाने भर से ही शरीर में कुछ गर्माहट का अहसास होता है ! लेकिन प्रिय आज रात भर मन बहुत ही बेचैनी से भरा रहा कि जब चाँद आसमा में नहीं आता है तो वो कितना परेशान हो जाता होगा ...हद से ज्यादा मुस्कराता होगा ......अपने गम छुपाने के लिए ........प्रिय आप जानते हो न कि तन्हाइयाँ बहुत दर्द देती हैं ...बहुत तकलीफ से भर देती है ......लेकिन उस वक्त हम यह कैसे भूल जाते हैं कि वो भी तो इतना ही उदास और तन्हा होंगे .....हाँ प्रिय यही सच है कि हम अपने स्वार्थ में अंधे होकर सिर्फ अपने दुखों को दर्द को लेकर बेचैन होते हैं रोते हैं लेकिन हम आपका गम आपका दर्द आपकी ...
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दिल की अतल गहराईयों में तुम्हें बसा लिया है रग रग में सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम लिख लिया है ज़रूरत नहीं रही दुनियाँबी दिखावे की मुझे इस तरह चाहा और तुम्हें अपना बना लिया है मिटाया है मैनें ख़ुद को तेरी चाहत में सनम आँखों में बस तेरा ही अक्स बसा लिया है जाओगे भला कैसे तुम मुझसे दूर होकर इस तरह से मन से मन को मिला लिया है ! ! सीमा असीम