ख्वाहिश
मैं अपने पंखों को प्रसार कर उस संसार को देखना चाहती हूं जहां खिली खिली धूप हरदम रहती है जहां पर हरियाली अपना बसेरा बसाये है खुला खुला नीला आसमान है और फूल ऐसे चारों तरफ खिले रहते हैं रंग तो इतने खूबसूरत कि देखने का मन करता रहता है मन भरता ही नहीं कभी...
मैं उस खूबसूरत संसार को देखना चाहती हूं जहां पर मैं अपने पर सकूँ के साथ रह सकूं या अपना खूबसूरत सा संसार बसा सकूं..
जहां पर हो प्रेम अपनापन और सिर्फ खुशियां ही खुशियां हो मुस्कुराते हुए मन के साथ अपने मन के अंधेरे को मिटा कर रोशनी से भर लेना चाहती हूं..
बहुत दिन हुए उदासियों के बादलों से घिरे हुए मेरे मन को अब उसे एक खुला आसमान देना चाहती हूं और एक इतनी ऊंची उड़ान भरना चाहती हूँ ताकि उस ताजी हवा को महसूस कर सकूं जी सकूं.
जीवन को पूरे आनंद सेभरकर खुश रहूँ और खुशियां भी बाँट सकूं..
उन छोटे-छोटे बच्चों के साथ उनके बच्चों के जैसे ही होकर खिल खिला कर जोर से हंसो और दौड़ लगाऊं इतनी तेज कि उन बच्चों की कुलाची भरती हुई दौड़ को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाऊं आगे आगे ही आगे...
बस एक ख्वाहिश तो है और यह ख्वाहिश पूरी होने को है जल्दी ही है ना
सीमा असीम
8,12,25

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