जंगल
कभी किसी गहन सुनसान जंगल से गुजरते हुए
अक्सर मेरे मन में एक ख्याल आता है
कि इतना सूनापन सन्नाटा क्यों है इस जंगल में
क्योंकि यहां भी तो रहते हैं जीव जंतु और पक्षी उनकी भी तो आवाज होती है और उनका भी तो कोलाहल फिर क्यों इतना वीरानापन
फिर सोचती हूँ
यह दुनिया जो इंसानों की है वहां इतना शोर शराबा और इतनी आवाज़ है कहीं कोई शांति नहीं कोई सको नहीं सिर्फ शोर आवाज़ और कोलाहल
फिर भी कभी-कभी मुझे महसूस होता है कि इन सबके बाबजूद हर इंसान के अंदर इतना ही गहरा सन्नाटा है
इतना ही सुन्नपन है और इतना ही वीरानापन है
भले ही वह लाख सुख सुविधाओं और खुशियों के बीच क्यों न रह रहा हो है
लेकिन सही बात तो यह है कि हर इंसान के अंदर एक जंगल की तरह ही वीराना है सुनापन है
और सन्नाटा है
सीमा असीम सक्सेना

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