तेरा नाम

 क्यों यूँ जो तेरा नाम मेरी जुबाँ पर बार-बार आता है

सुबह ओ शाम हर पल हर क्षण जो बार बार आता है 

क्या हवाओं से तू पैगाम भेजता रहता है या फिर 

फ़िजाओं से तू बात करता रहता है कि 

तेरी खुशबू मेरे चारों तरफ बिखर जाती है 

 लबों पे ही तेरी बात हर बार आती है

 मेरे जेहन में तू हर समय भटकता रहता है 

 क्या अब तुझे कोई और कम नहीं रहता है 

 मेरा बायां अंग इस तरह से फड़कता है 

कि मुझे 

 मुस्कुराने को मजबूर कर देता है

 हिचकियों में कभी आराम नहीं आता है

 बस तू यह बता कि मुझे इस तरह से क्यों परेशान करता है

 क्या मुझे यादों में हर समय बसाए रखता है 

 या तू हर वक्त माला में बस मेरा नाम जपा करता है 

 बता कुछ तो जवाब दे किसी तरह से मुझे 

इस तरह से हवाओं से फिजाओं से ना तू 

मुझ तक अपनी बात को पहुंचा 

 बेकरार करके इस तरह क्या तुझे चैन आएगा

 मैं तो गुम होकर तेरी याद में 

 फिर कहीं तुझे ही


बावरा ना बन जाऊं...

सीमा असीम 

6,12, 25




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