आलस्य
कभी-कभी कुछ करने का बिल्कुल मन ही नहीं करता, न लिखने का मन, न पढ़ने का मन और न ही घर के किसी भी काम को करने का मन..ल
गता है मानो पूरे शरीर में आलस्य आ गया है और यह आलस्य कितना अच्छा लगता है, आराम से लेटे रहना, कुछ नहीं करना मतलब कुछ भी नहीं करना लेकिन तभी मुझे याद आते हैं..
अपने बहुत सारे वे कार्य जो अधूरे है और कुछ नए कार्य भी हैं जिन्हें पूरा करना है शुरू करना है..
इसके लिए मुझे इस आलस्य का त्याग करना होगा,छोड़ देना होगा आराम को हालांकि आलस्य इतना आनंददायक होता है कि इससे ज्यादा आनंद तो किसी मनपसंद फिल्म को देखने में भी नहीं आता..
वैसे आराम से बैठकर, लेट कर कल्पनाओं में बिचरना, खुली खुली आँखों से सुंदर-सुंदर सपने देखना, बस यूँ सोचते रहना..
तभी खिड़की से नजर पड़ जाती है सामने खिले हुए फूलों की तरफ,पेड़ों की तरफ, पौधों की तरफ...
कितने आनंद के साथ साथ पत्ते हवा के साथ झूम रहे हैं मानो मदमस्त हो गये हैं और यह फूल कितने सुंदर हैं जो अपनी पूरी सुंदरता के साथ मनमोहक खुशबू बिखेर रहे हैं चारों तरफ..
यह तो नहीं आलस करते कभी भी..तभी तो यह झूम रहे हैं मज़े से और सबको खुशियाँ दे रहे हैं..
चलो छोड़ देती हूँ इस आलस्य को और थोड़ा सा घूम कर आती हूँ पार्क में, हवा संग झूमते पत्तों के बीच, पेड़ों के बीच, फूलों के बीच..
प्रकृति का आनंद लेते हुए हवा और खुशबू से खुद को तरोताज़ा करने को, फूलों की तरह खिलकर फूलों सी महकने को.....
सीमा असीम सक्सेना
16,12,25

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