आस की डोर

आज फिर हुआ मन उदास 

कहीं फूल झर न जाएँ 

मुश्किल से आई है बहार 

यह दिन यूँ ही गुजर न जाएँ 

यक़ीनन मैं तुम्हें याद करती हूँ 

फिर क्यों निराश होती हूँ 

मिल ही जायेगा नदी को रास्ता 

बस प्रार्थना बार बार करती हूँ 

मुझे नहीं मालूम है यह कि 

दिन आजकल इतने लम्बे क्यों हैं 

न जेठ का महिना न  गर्मी के दिन 

फिर यह जिन्दगी बेलोस क्यों है 

खैर छोडो बेकार की दुनियादारी 

प्रेम की राह पर चल पड़ी हूँ 

कुछ मिले न मिले परवाह नहीं 

आस की डोर थामे खड़ी हूँ ......

सीमा असीम 

१, 4,२४ 



Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

यात्रा